राज्य पुनर्गठन विधेयक, 1956 - Page 266

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की कोई अन्य व्यवस्था नहीं है, ठीक रहेगा। कुछ कारणों या अन्य कारणों से निजाम ने अपना प्यार और स्नेह मराठवाड़ा को छोड़कर अन्य लोगों को दिया। मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या मेरे मित्र काका गाडगिल, संयुक्त महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने पर मराठवाड़ा के लोगों की दशा की ओर ध्यान देंगे अथवा क्या वे अपना ध्यान पूना और उसके निवासियों की ओर देंगे। हमें निरर्थक बात नहीं करनी चाहिए। हमें उन बातों को उसी रूप में देखना चाहिए जिस में वे हैं। मराठवाड़ा को एक पृथक प्रान्त या राज्य की अनुमति क्यों नहीं होनी चाहिए और मराठवाड़ा को स्वयं शासन चलाने देना चाहिए। वे अपनी भलाई को अच्छी तरह जानते हैं। मैं मराठवाड़ा से केवल इस कारण से जुड़ा हुआ हूँ कि मैंने वहाँ एक कॉलेज की स्थापना की थी। लेकिन यह कॉलेज पनप नहीं रहा है और प्रतिवर्ष उससे मुझे भारी नुकसान हो रहा है। मैं यह जानता हूँ कि मराठवाड़ा के लोग बम्बई के उन लोगों की अपेक्षा स्वयं की अच्छी तरह देखभाल करेंगे, जो उनके बारे में बातें करते हैं। विशेष रूप से वहाँ बिल्कुल शिक्षा नहीं है। यह

खतरा है कि मराठवाड़ा को कहीं पूरा विश्वविद्यालय से न जोड़ दिया जाये। केवल ईश्वर ही जानता है कि क्या होगा।

श्री बी. बी. शर्मा (उत्तर प्रदेश) : अतः आप ईश्वर में विश्वास करते हैं?

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : आपने जो कहा है उसे मैं नहीं सुन सकता हूँ। यदि आप उसका उत्तर चाहते हैं, आपको कान खोलकर बात करनी चाहिए।

श्री बी. बी. शर्मा : वह किसका भगवान है?

श्री जसपत राय कपूर (उत्तर प्रदेश) : असुविधाजनक प्रश्नों को न सुनें।

श्री बी. बी. शर्मा : आपका ईश्वर कौन है?

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मेरे लिए लोग ही ईश्वर हैं। महोदय, मराठवाड़ा के मामले में यह सर्वथा आवश्यक है कि वहाँ के लोगों को एक पृथक स्वशासी निकाय मिले जो उनकी शिक्षा की देखभाल कर सके और वे पूरा विश्वविद्यालय के सम्मुख हाथ और पैर बांधकर खड़े न हों। हम ऐसा बिल्कुल नहीं चाहेंगे।

एक अन्य मुद्दा है जिसका मैं उल्लेख करना चाहूँगा। जैसाकि मैंने कहा है, मैं गलत भी हो सकता हूँ लेकिन मेरा यह विचार है कि इस संघ राज्य में बहुत से छिद्र हैं और यह टूट सकता है। हमारा टूटने वाला समाज है। हमारी कोई यूनियन नहीं है। हममें एकता नहीं है और किसी भी समय ये सारी चीज टूट सकती हैं। मैंने एक रास्ता सुझाया था कि उत्तर प्रान्तों की सीमा को घटाकर छोटा किया जाए ताकि दक्षिण के लोगों को भारी दबाव से कोई कठिनाई न हो सकें। मैंने दूसरा उपाय सुझाया है और वह सुझाव यह है कि इस देश की दो राजधानियाँ हों। मेरा सुझाव है