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महाराष्ट्र का है। मेरा विचार है कि माननीय सदस्य को ऐसा वक्तव्य उत्तरदायित्व की भावना से देना चाहिए।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह ‘टाइम्स आफ इंडिया’ में है।
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माननीय उपसभापति : मैं माननीय सदस्यों को सूचित करना चाहता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर से निम्नलिखित पत्र प्राप्त हुआ हैः-
‘‘मैं इलाज के लिए बंबई आया था और मुझे आशा थी कि मैं समय पर दिल्ली लौटने योग्य हो जाऊंगा। दुर्भाग्यवश मैं स्वस्थ नहीं हुआ हूँ। अतः मैं संसद आने में तथा अनुपस्थिति के सम्बन्ध में अनुमति के लिए प्रार्थना-पत्र देने में असमर्थ हूँ। मैं आशा करता हूँ कि राज्यसभा मेरे अनुरोध को मंजूर करेगी।’’
क्या सदन के अनुग्रह से डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को 29 मार्च, 1955 से नौवें सत्र के अंत तक की बैठकों और चालू सभा के दौरान हुई सभी बैठकों से अनुपस्थित रहने की अनुमति दी जाये?
(किसी भी माननीय सदस्य में विसम्मत नहीं था।)
अनुपस्थित रहने के लिए अनुमति दी जाती है।
निधन संबंधी उल्लेख - डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का निधन
** प्रधानमंत्री (श्री जवाहर लाल नेहरू) : उपसभापति महोदय, मुझे सभा को यह सूचित करते हुए गहरा अफसोस है कि इस सदन के एक सदस्य, जिसने बहुत से मामलों में बहुत ही अग्रणी भूमिका निभायी थी का थोड़ी देर पहले निधन हो गया है। वे सदस्य डॉ. बी. आर. अम्बेडकर हैं। डॉ. बी. आर. अम्बेडकर बहुत वर्षों तक भारतीय सार्वजनिक मामलों में एक बहुत विवादग्रस्त व्यक्ति रहे थे। लेकिन उनके विशिष्ट गुणों, उनके पांडित्य और दृढ़ विश्वास की गहनता कभी-कभी किसी विशेष विषय के लिए अपेक्षित गहनता से भी अधिक गहनता जिसकी प्रतिक्रिया हुई, के बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता है। लेकिन वे उस गहन भावना के प्रतीक थे जिसे हमें हमेशा याद रखना चाहिए, वे भारत में दलितों उसकी वह गहन भावना के प्रतीक थे जिन्हें पिछले युगों में पूर्व सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत परेशान किया गया है। और यह उतना ही ठीक है कि हम इस बोझ को मान्यता दें और हमेशा याद करें। यह हो सकता है कि हममें से कुछ लोगों ने यह सोचा हो, जैसाकि मैंने
* संसदीय वाद-विवाद (राज्य सभा), जिल्द- 10 ग, 1 अक्तूबर, 1955, पृ. 5529-30 ** संसदीय वाद-विवाद (राज्य सभा), जिल्द- 10 ग, 6 दिसम्बर, 1956, पृ. 1769-70