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लोकसभा
गुरुवार, 6 दिसम्बर, 1956 लोकसभा 11 बजे समवेत हुई
डॉ. अम्बेडकर का निधन
12.00 बजे प्रधानमंत्री और सदन के नेता (श्री जवाहरलाल नेहरू) : माननीय अध्यक्ष महोदय,
मुझे सदन को डॉ. अम्बेडकर के निधन का दुखद समाचार देना होगा। केवल दो दिन पहले ही, अर्थात् परसों वे दूसरी सभा जिसके वे सदस्य थे में उपस्थित थे। अतः, आज उनके निधन का समाचार हम सभी के लिए एक सदमे के रूप में आया है जिसके बारे में इतनी जल्दी इस प्रकार की घटना होने का कोई आभास भी नहीं था।
जैसा कि इस सदन का प्रत्येक सदस्य जानता है कि डॉ. अम्बेडकर ने भारत के संविधान की रचना करने के बाद में संविधान सभा के विधायी भाग और इसके बाद अंतरिम संसद में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इसके बाद कुछ समय वे संसद के सदस्य नहीं रहे। फिर वे राज्य में आये जिसके वे वर्तमान सदस्य थे।
अक्सर यह कहा जाता है कि वे हमारे संविधान के शिल्पियों में से एक थे। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि संविधान के किसी शिल्पी ने संविधान की रचना करने में उतनी रुचि और परेशानी नहीं उठायी जितनी डॉ. अम्बेडकर ने उठायी थी। हिंदू कानून में सुधार करने के संबंध में उनके द्वारा ली गई दिलचस्पी और उठायी गई परेशानियों के लिए भी उन्हें याद किया जायेगा। मुझे खुशी है कि उन्होंने इस सुधार को बहुत बड़े उपाय में देखा था कदाचित उस ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में नहीं जिसका उन्होंने स्वयं मसौदा तैयार किया था। अपितु पृथक-पृथक टुकड़ों में। लेकिन मैं कल्पना करता हूँ कि उन्हें जिस लिए सर्वाधिक याद किया जायेगा वह हिंदू समाज के सभी दमनकारी लक्षणों के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा। कभी-कभी वे ऐसी भाषा का प्रयोग करते थे जिससे लोगों को ठेस पहुंचती थी। वे कभी-कभी ऐसी बातें कहते थे जो शायद पूरी तरह न्याय, संगत नहीं हुआ करती थीं। लेकिन हमें उन्हें भूल जाना चाहिए। मुख्य बात यह थी कि उन्होंने कुछ ऐसी बातों के विरुद्ध विद्रोह किया जिनके विरुद्ध हम सभी को विद्रोह करना चाहिए था
* संसदीय वाद-विवाद, खंड- 10, भाग- II, 6 दिसम्बर, 1956, पृ. 2059-68