12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के लिए कुछ रेल सदस्य रेल प्रणाली के प्रबंधक द्वारा नियुक्त समितियों के सदस्यों के रूप में या वाणिज्य मंडल के अध्यक्षों के रूप में कार्य कर रहे हैं। वे उस सीमा तक सरकार के अधीन लाभ के पद धारण कर रहे हैं। क्या वे सब इसके अंतर्गत आते हैं? मैं चाहता हूँ, यह प्रश्न किसी संदेह से परे होना चाहिए। यदि केवल पाँच प्रवर्गों का उल्लेख किया गया है तो हमारे लिए केवल दो रास्ते खुले हैं या तो यह कि ये व्यक्ति छूट प्राप्त नहीं है और वे हमारी तरह रहते हैं; अथवा यह कि हम भी उनकी तरह छूट प्राप्त हैं। मेरा विनम्र निवेदन है कि इस सदन द्वारा इस विधेयक को, जैसा कि है, पारित करना न्यायोचित नहीं होगा। या तो श्री सिधवा का यह संशोधन स्वीकार किया जाए कि कतिपय सिद्धांत पर उन सभी सदस्यों को छूट दी जानी चाहिए और पुनर्वास सलाहकार को भी इस प्रवर्ग में सम्मिलित किया जाना चाहिए अथवा कोई सिद्धांत अधिकथित किया जाए, जो व्यापक प्रवर्तन का हो और उन पदों को धारण करने वालों को इस नियम की परिधि के अंतर्गत न आने वाला समझा जाए। जो डॉ. अम्बेडकर ने किया वह स्थिति की आकस्मिकताओं के अनुसार है, जैसा कि उन्होंने उस समय समझा था। किंतु अब, उनके ध्यान में अनेक नई चीजें लाई गई हैं और अन्य समितियों को सम्मिलित किए बिना इस प्रस्ताव को पारित करना न्यायोचित नहीं होगा।
जहाँ तक निरर्हता के प्रश्न का संबंध है, मेरा निवेदन है कि इन व्यक्तियों में से किसी ने भी वास्तव में निरर्हता उपगत नहीं की है क्योंकि इन व्यक्तियों में से कोई भी न तो इस बात को समझता था और न ही उन्हें इस बात का पूर्ण ज्ञान था कि वास्तव में उस पद को स्वीकार करके वे निरर्हता के अंतर्गत आ रहे हैं। जब यह स्थिति है, तो उन्हें निरर्हता नहीं मानना चाहिए। पिछली बातों की बाबत, यह कहा जाना चाहिए कि वे पद, ऐसे पद थे, जिनके बारे में कोई निरर्हता नहीं थी। जब तक यह नहीं किया जाता है, यह संरक्षण विधेयक, संरक्षण विधेयक नहीं होगा, क्योंकि आप उन व्यक्तियों को संरक्षण नहीं दे रहे हैं बल्कि आप पदों को संरक्षण दे रहे हैं। यदि आप व्यक्तियों को भी मुक्त रखते हैं तो आप ठीक करते हैं। वही मेरा निवेदन है।
डॉ. अम्बेडकर : संसद-सदस्यों के दृष्टिकोण से यह विधेयक बहुत ही नाजुक
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विधेयक है और मैं माननीय सदस्यों को यह स्मरण कराने से प्रारंभ करूँगा कि इस विधेयक के उपबंधों पर विचार करते समय वे अति उत्साही होने के बारे में बहुत सावधान रहें। मेरे माननीय मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव अकेले ऐसे सदस्य थे जिन्होंने मामले के इस पहलू पर अति संक्षेप में प्रकाश डाला था। वह ऐसा मुद्दा था जिस पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए था। जिस कारण, संविधान के अनुच्छेद 102 में इस उपबंध को सम्मिलित किया गया था वह बहुत ही सारवान था। यह संसद की स्वाधीनता को संरक्षित रखने के लिए उद्दिष्ट था और इसके