(18) उच्चतम न्यायालय में सरकारी अभिकर्ता - Page 310

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नए संविधान के लागू हो जाने पर उच्चतम न्यायालय की स्थापना से केन्द्र और राज्य सरकारों के संबंध में उच्चतम न्यायालय के सामने आने वाले मामलों में भारी वृद्धि हो गई है। बड़े पैमाने पर इन संवैधानिक परिवर्तनों के कारण ऐसे मामलों में नयी-नयी और पेचीदा समस्याएं खड़ी हुई हैं। यह माना गया था कि देश के सबसे बड़े अधिकरण उच्चतम न्यायालय के समक्ष आए सभी मामलों पर सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए चाहे वह मामला सिविल हो अथवा दंडिक हो और जिसमें भारत सरकार अथवा किसी भी राज्य सरकार का हित हो वह मामला किसी केन्द्रीय एजेन्सी को सौंपा जाना चाहिए ओर उस एजेन्सी में फेडरल कोर्ट के व्यवहार तथा प्रक्रिया तथा सरकारी प्रशासन में अनुभव रखने वाले उन कर्मियों को रखा जाना चाहिए जो नए संविधान का भी ज्ञान रखते हों। जब इस प्रस्ताव को भाग ‘क’ तथा ‘ख’ की राज्य सरकारों के सम्मुख रखा गया तो उनमें से 10 राज्यों ने इसे स्वीकार किया था।

(ग) इस केन्द्रीय एजेन्सी पर चालू वित्त वर्ष के दौरान लगभग 47,600 रुपए और अगले वित्तीय वर्ष के दौरान 87,400 रुपए व्यय होने का अनुमान है। इस व्यय को केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों द्वारा प्रत्येक सरकार के मामलों की संख्या और मामलों की प्रकृति के आधार पर आनुपातिक रूप से वहन किया जाएगा। भाग लेने वाली राज्य सरकारों द्वारा चालू वर्ष के लिए भुगतान योग्य धनराशि का आकलन वर्ष के अंत में ही किया जा सकता है।

(घ) केन्द्रीय एजेन्सी अनुभाग की स्थापना से पूर्व केन्द्रीय सरकार के लिए एजेन्सी का कार्य सरकारी सालिसिटरों द्वारा किया जाता था और साथ ही उसे सालिसिटर शाखा में सामान्य सलाह मशविरे का कार्य भी करना होता था। इस प्रकार प्रत्येक रियासत तथा राज्य सरकार की अपनी अलग-अलग व्यवस्था होती थी। केन्द्रीय एजेन्सी की स्थापना से स्वभावता धन की बचत होगी और कार्यक्षमता में वृद्धि होगी, विशेषकर राज्य सरकारों के मामले में। इससे उच्चतम न्यायालय के समक्ष आने वाले विभिन्न संवैधानिक मसलों पर राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार के बीच बेहतर समन्वय की स्थापना होगी।

श्री राज बहादुर : मैं जानना चाहता हूँ कि क्या किसी राज्य ने इन प्रस्तावों को अनुमोदित नहीं किया है अथवा इन्हें अस्वीकार किया है?

डॉ. अम्बेडकर : मुझे नहीं मालूम कि किस राज्य ने इसका अनुमोदन नहीं किया है परन्तु मैं पहले भी कह चुका हूँ कि इन राज्यों ने अपनी सहमति दे दी है और असम, पश्चिम बंगाल, मद्रास, पंजाब और उत्तर प्रदेश ने इस योजना में भाग नहीं लिया है। शायद वे अब भाग लें।

श्री राज बहादुर : मैं उन राज्यों की संख्या जानना चाहता हूँ जिन्होंने इस प्रस्ताव