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के अभिभाषण में स्पष्ट रूप से उल्लिखित विषयों से संबंधित संशोधनों को स्वीकृति दी जाएगी। आपकी बात का सम्मान करते हुए मेरा विचार यह है कि इस नियम की व्याख्या भिन्न प्रकार से है। अभिभाषण पर वाद-विवाद का अभिप्राय है कि विरोधी पक्ष सरकार को बताए कि सरकार को किन विषयों को अभिभाषण में सम्मिलित करना चाहिए था। इसलिये राष्ट्रपति के अभिभाषण में यदि कोई विषय सम्मिलित नहीं किया गया है तो वह इसी कारण से तात्कालिक बन जाता है क्योंकि विरोधी पक्ष महसूस कर सकता है कि सरकार ने ऐसे विषयों को अभिभाषण में सम्मिलित किया है जो उसके विचार में अन्य विषयों की अपेक्षा कम महत्वपूर्ण है। दूसरी बात यह है कि मेरे विचार में किसी संशोधन की केवल इसलिए उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए क्योंकि वह ऐसे विषय से संबंधित है जो राष्ट्रपति के अभिभाषण में सम्मिलित नहीं किया गया, बल्कि विरोधी पक्ष को ऐसे विषय विशेष पर चर्चा करने और अपने विचार सरकार के समक्ष रखने का अवसर देना चाहिए जो संशोधन से संबंधित हो और जिसे राष्ट्रपति के अभिभाषण में सम्मिलित विषयों से अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मैंने सोचा कि मैं आपको यह सब कुछ बता दूं ताकि आप संशोधनों संबंधी प्रक्रिया को विनियमित कर सकें।
परिषद के नेता (श्री एन. गोपाल स्वामी) : मैं माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर द्वारा
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रखे गए दृष्टिकोण से सहमत हूँ।
डॉ. अम्बेडकर : इस सदन में अब कोई व्यक्ति ‘माननीय’ नहीं रहा।
श्री एन. गोपाल स्वामी : मैंने उनको ‘मेरे माननीय मित्र’ कहा है। ऐसा कहने पर तो कोई प्रतिबंध नहीं है।
महोदय, इस संबंध में हमारे विचारार्थ वास्तविक बात यह है कि क्या इस सदन की प्रक्रिया के लिए निर्मित संविधान और नियम माननीय मित्र द्वारा दिए गए सुझाव को कार्यरूप देने की अनुमति देते हैं।
* डॉ. अम्बेडकर (बंबई) : मैंने पहले इस वाद-विवाद में भाग न लेने पर विचार किया था ताकि इस सभा के नए सदस्यों को, जो विरोधी पक्ष की आगे की सीटों पर बैठे हैं, राष्ट्रपति के अभिभाषण से संबंधित महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार व्यक्त करने का पूरा अवसर दिया जा सके। परंतु मेरे कुछ मित्रों ने कहा कि यदि मैं दो महत्वपूर्ण मामलों के बारे में, जो निश्चित ही सभा के सदस्यों के मन में भी हैं और अधिकांश जनता के मन में भी हैं, अपने विचार व्यक्त कर देता हूँ, तो वह लाभप्रद रहेगा। पहला मामला, जिसके बारे में अधिकांश लोग चिंत्ति हैं वह खाद्यान का है। निश्चय ही देश को इस बड़ी भारी अभूतपूर्व समस्या का सामना करना पड़ा है। महोदय, अल्पायु में ही मैंने अकाल की स्थिति को देखा था क्योंकि मेरे पिता अकाल राहत कार्य में संलग्न
* संसदीय वाद-विवाद (राजय सभा), जिल्द- 1, 21 मई, 1952, पृ. 266-69