306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अनेक लोगों को, मजूरी के रूप में, धनराशि वितरित करते थे। मैं उनके साथ ही रहता था और अकाल ग्रस्त लोगों की हालत को देखता था। मैंने अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के कारण एक महान भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी रमेश चंद्र दत्त, जिन्होंने इस देश पर अंग्रेजों द्वारा कब्जा किये जाने के समय से लेकर इस देश में समय-समय पर पड़े अकाल का पूरा ब्यौरा दिया है, द्वारा लिखित शानदार किताबों को पढ़ा था। परंतु महोदय, पिछले इतिहास को स्मरण करते हुए, यह बात मेरी कल्पना से परे है कि मैंने जो कुछ देखा था अथवा पढ़ा था उसकी तुलना आज की स्थिति से की जा सकती है। मेरे विचार में, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक समय था जब अकाल पड़ते थे परंतु वे 10-15 अथवा 20 वर्षों के बाद पड़ते थे। आज हमारी स्थिति यह है कि इस देश में लगभग हर माह अकाल पड़ता है। इस महीने बिहार में अकाल पड़ा है तो दूसरे महीने रायलसीमा में अकाल पड़ा है और तीसरे महीने देश के किसी अन्य भाग में अकाल पड़ा है। मेरे विचार में, समाचार-पत्र पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति यह बात नहीं कह सकता कि कोई ऐसा महीना गुज़रा है जिसमें इस देश के किसी भाग में अकाल न पड़ा हो। मैं काँग्रेस पार्टी के कुछ सदस्यों द्वारा दिए गए इस तर्क को बड़े ध्यान से सुन रहा था कि विरोधी पक्ष को सरकार की कटु आलोचना नहीं करनी चाहिए। विरोधी पक्ष को स्मरण रखना होगा कि जब अंग्रेज भारत छोड़कर गये, तो अनाज के गोदाम खाली पड़े थे, साधन अविकसित थे और लोग आर्थिक उत्पादन के मामले में अप्रशिक्षित थे। यदि मैं, सम्मानपूर्वक कहूँ तो इन तर्कों में कोई सार नहीं है। यह बात इस सदन को पसंद आ सकती है या उनको अच्छी लग सकती है जो सदन में सत्ताधारी दल के प्रति नर्म रुख रखते हैं, परंतु मैं अपने मित्रों से भी कहना चाहता हूँ कि जनता इस तर्क को अधिक समय तक स्वीकार नहीं करेगी।
एक माननीय सदस्य : आप स्वयं भी तो सरकार में रह चुके हैं।
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डॉ. अम्बेडकर : आप मेरे अतीत पर ध्यान न दें। अब मेरा संबंध विच्छेद हो चुका
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है। मैं सत्ताधारी पक्ष को बताना चाहता हूँ कि यह बहाना अधिक समय तक नहीं चल सकता। कोई भूखा आदमी किसी ऐसे आलोचक से सहानुभूति नहीं रख सकता जो उसको बताए ‘‘मेरे प्यारे मित्र, यद्यपि मेरे पास शक्ति है, सत्ता भी है, स्थिति का समाधान करने के लिए सभी कानूनी शक्तियाँ मुझे प्राप्त हैं फिर भी आप मुझसे आशा मत करना कि मैं कोई जादू कर दिखाऊंगा क्योंकि हमारा अतीत कोई बहुत अच्छा नहीं था’’ यदि यह सरकार कुछ ही समय में लोगों के निराश और हताश होने से पहले स्थिति का समाधान नहीं करती है तो लोग महसूस करने लगेंगे कि इससे बेहतर होगा कि कोई सरकार न हो। एक समय ऐसा आएगा जब, यदि संसद में बैठे हम लोग उचित समय के भीतर, जनता के कल्याण और उसकी भलाई के काम की जिम्मेदारी को नहीं समझते तो मुझे कोई संदेह नहीं है कि बाहर बैठी आम जनता हमें