308 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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बजट (साधरण), 1952-53 - आम चर्चा
* डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बंबई) : सभापति महोदय, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर
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अपने विचार रखते हुए जहाँ मैंने अपनी बात समाप्त की थी, वहीं से मैं आगे बढ़ता हूँ। सदन को स्मरण होगा कि जब मुझे अपना भाषण बंद करना पड़ा तथा तब मैं
खाद्यान इमदाद के विषय पर बोल रहा था। आज मैं उस मामले से निपटने के लिये बेहतर स्थिति में हूँ। इसी बीच वित्त मंत्री का एक वक्तव्य भी आ गया है जिसमें उन्होंने अचानक पहलू बदल लेने को न्यायोचित बताया है। वित्त मंत्री ने यह जो स्पष्टीकरण दिया है वह संभवतः लोगों को डराने के लिए दिया है ताकि वे भविष्य में खाद्यान पर इमदाद देने के संबंध में कोई कार्यवाही करते हैं तो उनको यह कार्यवाही इस प्रकार करनी होगी कि वह पिछले वर्ष व्याप्त मूल्य स्तर को बनाए रख सकें। मेरे विचार में, यह बात भूमिका के रूप में कही गई थी। उसके बाद उन्होंने आगे कहा था कि यदि गत वर्ष के मूल्य स्तर को बनाए रखने के विचार से इमदाद दी जाती है और यदि इसको औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित रखा जाता है तो सरकार को 60 करोड़ रुपये देने पड़ते हैं और यदि इस इमदाद को ग्रामीण क्षेत्रों तक बढ़ाया जाए तो सरकार को 90 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे। इससे स्पष्ट हो जाता है कि यदि ये आंकड़े सही हैं, तो यह सब कुछ बहुत ही उत्साही जनों को जो किसी न किसी रूप में इमदाद दिए जाने के पक्ष में हैं जिससे उपभोक्ता वर्गों की दुर्दशा में कुछ सुधार हो सके, संयत रखने का सोच-समझ कर प्रयास किया गया है। जहाँ तक मैं समझता हूँ किसी भी व्यक्ति की इतनी बड़ी कल्पना नहीं हो सकती जिसका आधार वित्त मंत्री ने बताया है और प्रस्तुत किया है। विभिन्न समाचार-पत्रों में भी इस विषय पर चर्चा की गई है और जहाँ तक मैंने उसको समझा है किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं कहा कि आप इतनी अधिक इमदाद दें कि इस वर्ष का मूल्य स्तर भी उतना ही रहे जितना कि गत वर्ष वर्ष में था। किसी भी व्यक्ति ने ऐसी मांग नहीं की है। महोदय, जहाँ तक ग्रामीण क्षेत्रों की मांग का संबंध है जिसे माननीय वित्त मंत्री ने इमदाद न दिए जाने का आधार बताया है, मुझे खेद है कि उन्होंने अब इस तथ्य को स्वीकार किया है जिसके बारे में हम गत अनेक वर्षों से कहते आ रहे हैं परंतु वह इस बात से इन्कार करते रहे हैं। मुझे पता है कि प्रांतीय मंत्रियों की यह
* संसदीय वाद-विवाद (राजय सभा), जिल्द- 1, 27 मई, 1952, पृ. 469-80