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किंतु, मैं उसका सकारात्मक पक्ष प्रस्तुत करना चाहता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह ईमानदार आदमी हैं और वह दिल से जनता की भलाई चाहते हैं। वह क्या करने का प्रयत्न कर रहे हैं? जहाँ तक मैं भारत सरकार की खाद्यान संबंधी नीति को समझ पाया हूँ मेरे विचार में, माननीय वित्त मंत्री इमदाद के विरुद्ध नहीं हैं। यदि मैं उनकी स्थिति को जैसे कि समझता हूँ ठीक व्यक्त करूं तो वह इमदाद के पक्ष में हैं। परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि वह उपभोक्ता के बजाए उत्पादक को इमदाद देना चाहते हैं जो अधिक अन्न उपजाओ, अनुदान के रूप में हो सकती है या किसी अन्य रूप में भी हो सकती है। तार्किक दृष्टि से उनका विचार स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यदि देश में खाद्यान का उत्पादन अधिक होता है तो मूल्यों में गिरावट आएगी, उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचेगा और फिर उपभोक्ताओं को इमदाद देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। मेरे विचार में यदि मैंने उनकी स्थिति सही रूप से समझी है तो मैंने उसकी सही अभिव्यक्ति की है। वह इमदाद के पक्ष में है किंतु वह उत्पादक को देना चाहते हैं उपभोक्ता को नहीं।
महोदय, यह एक प्रकार का दृष्टिकोण हो सकता है, हममें से कुछ अन्य सदस्यों का इससे अलग भी दृष्टिकोण हो सकता है। मेरे विचार में इस दृष्टिकोण के संबंध में हमें यह प्रश्न पूछना है कि इनमें से कौन-सा दृष्टिकोण जनता को शीघ्र लाभ पहुंचाने वाला है? जहाँ तक अधिक खाद्यान उपजाओ संबंधी नीति के लिए इमदाद उपलब्ध कराने का संबंध हे, मेरे विचार में, सरकार कह सकती है कि जहाँ तक
खाद्य उत्पादन का संबंध है, इसका कोई लाभ नहीं हुआ है। मेरे विचार में, विपक्ष के सदस्यों को इसके लिए कोई नजीर प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम सब इस बात को जानते हैं कि रिजर्व बैंक ने एक जांच की थी और उसमें बताया गया था कि अधिक अन्न उपजाओं की नीति पूरी तरह असफल सिद्ध हुई है। अतः इससे स्पष्ट है कि इमदाद उपभोक्ताओं के बजाय उत्पादक को देकर कोई वांछनीय परिणाम नहीं निकला है।
दूसरी बात यह है कि ‘अधिक खाद्यान उपजाओ’ पर जोर देने वाली योजना,
खाद्य विभाग अथवा भारत सरकार द्वारा परस्पर विरोधी नीति अपनाए जाने के कारण असफल रही हे। वे एक ओर किसानों को तथा अन्य लोगों को इमदाद देते रहे हैं ताकि वे अधिक उत्पादन करें तथा दूसरी ओर वे नगदी फसलों को प्रोत्साहित करने के लिए कार्यवाही करते रहे हैं जिनकी प्रतिस्पर्धा खाद्य उत्पादन के साथ चलती रहती है। किसान बिनौले के उत्पादन और काली मिर्च जैसी चीजों के उत्पादन को अधिक लाभप्रद मानता है वह अधिक खाद्यान उत्पादन की ओर अधिक ध्यान नहीं देता। निश्चय ही, यदि सरकार का उद्देश्य और पक्का इरादा खाद्य का उत्पादन बढ़ाने का है तो उसे कुछ ऐसे ठोस कदम उठाने होंगे जिससे किसान खाद्यान के भिन्न उपजों की दिशा में न सोचे। सरकार ने इस प्रकार का कोई कदम नहीं