312 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उठाया है, इसका परिणाम यह है कि कृषि क्षेत्र में इस देश में दो प्रतिस्पर्धी आर्थिक गतिविधियाँ चल रही हैं-नगदी फसलें बनाम खाद्य उत्पादन।
इसका परिणाम यह हुआ है कि अधिक अन्न उपजाओ संबंधी अभियान के बावजूद और उस पर किए गए खर्च के बावजूद हम इतना उत्पादन नहीं बढ़ा सके जिसका कि अनाज के मूल्यों पर कोई प्रभाव पड़ता। अब मैं माननीय वित्त मंत्री से यह प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि क्या वह इस बात को महसूस करते हैं अथवा नहीं कि यदि अधिक खाद्यान्न उपजाकर मूल्यों में गिरावट लाने का उनका उद्देश्य पूरा नहीं होता है तो क्या वह इसके बावजूद उपभोक्ता को दंडित करते रहेंगे और उसको कोई इमदाद नहीं देंगे या कोई अन्य राहत नहीं देंगे, जिससे वह दयनीय स्थिति से उभर सकें? इस बात में कोई विवाद नहीं है कि जिस प्रकार की स्थिति से हम गुजर रहे हैं उसमें हमारे देश में किसी न किसी रूप में इमदाद आवश्यक है। बात इतनी सी है कि किस समय रक्त की पूर्ति की जानी है, किस स्तर पर - उत्पादन के स्तर पर अथवा उपभोक्ता के स्तर पर इमदाद दी जानी है। मैं इस आशा के साथ यह टिप्पणी कर रहा हूँ कि माननीय वित्त मंत्री पुनः इस बात पर विचार करेंगे कि हमारी समस्या का तत्काल समाधान उपभोक्ता को इमदाद देने के बजाय उत्पादक को देने से हो सकता हे। हो सकता है कि उनको सफलता मिल जाए। जैसा कि हम जानते हैं, पहले हमारी सरकार ने, जब मैं उसका सदस्य था, घोषणा की थी कि हमें वर्ष 1952 तक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लेनी चाहिए। हमारे प्रधानमंत्री आये दिन इस बात पर जोर देते हैं कि वर्ष 1952 के बाद हम अनाज का एक दाना भी बाहर से आयात नहीं करेंगे। मेरे विचार में, आज मैं ठीक ही कह रहा हूँ कि भारत सरकार अब महसूस करने लगी है कि आत्मनिर्भरता प्राप्ति कोरा सपना है। उन्होंने अब घोषणा कर दी है कि वे वर्ष 1956 तक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लेंगे। परमात्मा ही जाने। आए दिन लक्ष्य को कम किया जाता है। हम कह नहीं सकते कि इस देश की जनता को कितने वर्षों तक यह कष्ट भोगना पडे़गा और वित्त मंत्री तथा खाद्य मंत्री विभिन्न विचार, प्रस्ताव व योजनाएं बना कर, जैसेकि प्रयोगशाला में प्रयोग किए जाते हैं, इस मामले में विलम्ब करते रहेंगे। मैं इस विषय पर और विस्तार से कुछ नहीं कहना चाहता।
महोदय, अब मैं समग्रतः साधारण बजट के संबंध में कुछ शब्द कहना चाहता हूँ। निःसंदेह प्रत्येक देश में बजट में बताया जाता है कि सरकार जनता के लिए क्या-क्या काम करेगी। इस देश में एक बार ऐसा भी समय था जब ब्रिटिश सरकार का काम कर वसूल करना और शांति तथा व्यवस्था बनाए रखना था। उनके बजट में जनता का कल्याण, लोगों की भलाई, उनकी शैक्षणिक प्रगति, जन स्वास्थ्य, बेरोजगारी या इन समस्याओं का समाधान और राहत व्यवस्था आदि का, जिनका