314 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
राजस्व बढ़ता है वैसे-वैसे हमारा सैन्य खर्च भी बढ़ता है। मेरे विचार में, यह प्रक्रिया उल्टी होनी चाहिए थी। सैन्य खर्च कम हो जाना चाहिए था। यदि आप अपने सैन्य
खर्च में 50 करोड़ रुपये की भी कमी कर लेते तो हम जनता की कितनी भलाई कर सकते थे? सैन्य खर्च में कम किये गये इस 50 करोड़ रुपये की राशि को हम नदी घाटी परियोजनाओं पर लगा सकते थे। विदेशों से सहायता मांगने के बजाए हम दामोदर घाटी परियोजना को 3 वर्ष में पूरा कर सकते थे। यदि हम सैन्य बजट की इस 50 करोड़ रुपये की राशि को अपनी जनता की बेहतरी के लिये खर्च करते तब हम लोगों की कितनी भलाई कर सकते थे? मैं यह बात समझने में असमर्थ हूँ कि भारत सरकार किन कारणों से सैन्य बजट में निरंतर वृद्धि करती जा रही है। महोदय, एक अन्य दृष्टि से भी, यह एक असाधारण स्थिति है। हमें बताया गया है कि हमारी विदेश नीति शांति और मैत्री की नीति है। मेरे माननीय मित्र दीवान चमन लाल ने इसका, नेहरू का नाम दिया है। यदि नेहरू नीति का यही उद्देश्य है तो इसका स्वागत है, किंतु तभी, जब सभी लोग इसका पालन करें। अब, यदि इस देश की विदेश नीति का उद्देश्य समूचे विश्व में मित्रता और शांति बनाये रखना है तो मैं अपने शत्रुओं के बारे में जानना चाहता हूँ जिनका मुकाबला करने के लिये हम 197 करोड़ रुपये की लागत पर इतनी बड़ी सेना तैयार रखना चाहते हैं।
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डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं इस बात को नहीं जानता। यदि हमें यह बात बताई
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जाती कि हमारे संबंध किसी अन्य देश से अच्छे नहीं हैं, कि हमारी सुरक्षा को किसी भी समय ख़तरा हो सकता है तो हममें से अधिकांश लोग इस बात पर सहमत हो जाते कि ख़तरे की प्रतीक्षा करने के बजाय हमें अपनी सेना को तैयार रखना चाहिए ताकि किसी आपात् स्थिति में हम उस ख़तरे का दृढ़ता से मुकाबला कर सकें। किंतु हमें तो यह बताया गया था कि इस विश्व में हमारा कोई शत्रु नहीं है। फिर मुझे नहीं पता कि इतनी बड़ी सेना रखने की क्या आवश्यकता है। दूसरे, यदि शत्रु हो सकता है, यदि हम इस शब्द का प्रयोग करते हैं तो, वह पाकिस्तान ही हो सकता है, और वह भी कश्मीर के कारण। अब, जहाँ तक कश्मीर का संबंध है, मुझे आशा है कि इस सदन को उस पर विस्तृत चर्चा करने का अवसर मिलेगा। इस विषय पर कुछ कहने का मेरे पास समय भी नहीं है और कश्मीर जैसी बड़ी समस्या पर कुछ शब्द कहना मैं उचित भी नहीं समझता। किंतु निश्चय ही यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णय से पूर्व कश्मीर अथवा इस देश पर आक्रमण करने की मूर्खता करेगा। अतः इतनी बड़ी सेना बनाये रखने की क्या आवश्यकता है? यह बात मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आती।