45. बजट (साधारण) 1952-53 - Page 332

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फिर, महोदय, संभवतः हमने कभी इस बात को महसूस नहीं किया कि जितना शीघ्र कश्मीर की समस्या सुलझ जाएगी उतना ही अच्छा होगा क्योंकि यदि हम कश्मीर विवाद के कारण ही रक्षा बजट में भारी वृद्धि करते हैं तो क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि हम उस विवाद का अंत करने के लिये कोई ठोस कदम उठाएं। मैं इस विषय पर विस्तार से कुछ कह नहीं सकता किंतु जहाँ तक मैंने, कश्मीर के मामले के समाधान के लिए हुई बातचीत का अध्ययन किया है उसमें भारत सरकार ने जो भूमिका अदा की है, मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि उसमें एक भी शब्द मुझे ऐसा नहीं मिला जिससे उसकी सकारात्मक भूमिका की झलक मिलती हो। भारत ने इस मामले में नकारात्मक दृष्टिकोण ही अपनाया है। वे केवल सैन्य स्थापना पर ही विचार करते रहे हैं। जनमत की बात विश्व के इतिहास में कोई नई बात नहीं है। इस प्रकार के मामलों को जनमत के माध्यम से किये जाने के पूर्ववर्ती दृष्टांतों का पता लगाने के लिये अधिक अतीत में जाने की जरूरत नहीं है। पहले विश्व युद्ध के पश्चात्, मुझे अच्छी तरह से याद है कि दो मामलों को जनमत द्वारा हल किया जाना था। एक मामला अपर सिलेसिया का था और दूसरा एलसके लोरेन का था। इन दोनों मामलों का समाधान जनमत द्वारा किया गया था। मुझे विश्वास है कि मेरे माननीय मित्र श्री गोपालास्वामी आयंगर को, जो परिपक्व व तीव्र बुद्धि वाले व्यक्ति हैं, इस बात की पूरी जानकारी होगी। कि क्या हम अपर सिलेसिया और एलसके लोरेन में कराये गये जनमत के बारे में लीग आफ़ नेशन्स द्वारा की गई कार्यवाही के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते हैं और इस व्यवस्था का उपयोग कश्मीर के मामले में नहीं कर सकते हैं और उसका शीघ्र समाधान नहीं कर सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप हम रक्षा बजट में से 50 करोड़ रुपये निकाल सकते हैं और उसका उपयोग अपनी जनता की भलाई के लिए कर सकते हैं।

मैं इससे अधिक कुछ नहीं कहना चाहता परंतु इतना अवश्य कहना चाहता हूँ कि हममें से अधिकांश लोग यह महसूस करते हैं कि इस देश की जनता के कल्याण के मार्ग में रक्षा बजट बहुत बड़ी बाधा है।

एक और बात है जिसकी ओर मैं वित्त मंत्री का ध्यान दिलाना चाहता हूँ। उन्होंने अपने बजट संबंधी भाषण में संकेत दिया था कि भविष्य में इस देश में, जहाँ तक कराधान का संबंध है, कोई बहुत अच्छी संभावना नहीं है। उन्होंने स्वयं इस बात को स्वीकार किया है कि हमारे आय-कर राजस्व का स्तर वही नहीं रहेगा जो गत दो वर्षों में रहा है। वह भली-भांति जानते हैं कि निर्यात शुल्क, जो हमारे देश के वर्तमान राजस्व का बहुत बड़ा हिस्सा है अब इस देश के राजस्व ढांचे का स्थायी अंग रहने वाला नहीं है। निर्यात शुल्क को, जिसका स्वरूप सभी देशों में असामान्य