316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
व असाधारण रहता है, किसी देश के कर ढांचे का सहज अंग नहीं करार दिया जा सकता क्योंकि वह अन्य देशों में विद्यमान परिस्थितियों पर निर्भर करता है। जैसे ही उन स्थितियों में भिन्नता दिखाई देती है, आपको कर में अंतर रखना पड़ता है। आपको ऐसी भी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जब ऐसे शुल्कों को पूरी तरह छोड़ देना पड़े। मेरे विचार में राजस्व में कमी की आशंका की संभावना का कारण यही है। राजस्व में कुछ मदों को कम कर देने से जो हानि होगी उसे राजस्व के खाते में पूरी करने के बारे में वित्त मंत्री का क्या प्रस्ताव है? क्या वह रक्षा बजट में कमी करेंगे अथवा जनता के समाज कल्याण विभागों के बजट में कटौती करेंगे? मुझे कुछ पता नहीं है। यदि सैन्य बल व खर्च का वर्तमान स्तर बनाए रखा गया तो जहाँ तक जनता के कल्याण की स्थिति का संबंध है वह काफी बिगड़ जाएगी। मैं चाहता हूँ कि वित्त मंत्री इस बात को ध्यान में रखें और हमें बताएं कि जब ठोस रूप में ऐसी संभावना उनके सामने आ जाएगी तो वह क्या करेंगे।
*****
| fo | èk | s; | d | Col5 |
|---|
(46)
माननीय सभापति : प्रस्ताव रखा गयाः
| ek | uuh |
|---|
‘‘कि आंध्र राज्य के निर्माण मैसूर राज्य के क्षेत्रों को बढ़ाने और मद्रास राज्य के क्षेत्र को कम करने तथा तत्संबंधी विषयों के लिए विधेयक (लोकसभा द्वारा पारित रूप में) विचार किया जाए।’’
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बंबई) : सभापति महोदय, इस विधेयक का उद्देश्य
| vEcsMd | j |
|---|
आंध्रवासियों के लिए एक नया राज्य बनाना है। वैसे तो यह मामला आंध्रवासियों का ही है, अन्य सदस्य जो आंध्र से संबंधित नहीं हैं वे सामान्य रूप से भाग ले सकते हैं, क्योंकि इस नये प्रांत के बन जाने से भाषा के आधार पर कुछ अन्य प्रांत बनाए जाने की मांग को बल मिलेगा। इस प्रकार पश्चात्वर्ती भावनाओं के कारण ही मैं कुछ शब्द कहने के लिये खड़ा हुआ हूँ।
महोदय, यदि हम इस विधेयक का अध्ययन करें, तो हम असमंजस में पड़ जाते हैं कि क्या सदन में लाए गए इस विधेयक के लिए सरकार को धन्यवाद देना चाहिए या आंध्रवासियों को धन्यवाद देना चाहिए जो अलग प्रांत की उत्कट मांग करते रहे
* संसदीय वाद-विवाद (राजय सभा), जिल्द- 4, 2 सितम्बर, 1953, पृ. 864-79