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हैं। इस सदन के सभी सदस्य जानते हैं, ज्योंही काँग्रेस पार्टी संगठित हुई और वर्ष 1921 में उसका संविधान बनाया गया, सबसे पहले इसने संविधान में भाषायी प्रांतों के सिद्धांत को शामिल करने का काम किया। मुझे इस बात का कोई ख्याल नहीं है, कि वर्ष 1921 से लेकर वर्ष 1949 तक किसी समय या इसके आसपास काँग्रेस ने इस सिद्धांत को संविधान में से निकाला हो या संविधान में उसको शामिल किए जाने पर खेद व्यक्त किया हो। वर्ष 1949 में, मेरा विचार है- यदि मैं गलती पर हूँ तो आप उसमें सुधार कर सकते हैं-कि यह वह वर्ष था, जब प्रारूपण समिति अपना काम कर रही थी और तत्कालीन विधानसभा के एक सदस्य ने भाषायी प्रांत बनाये जाने के संबंध में एक संकल्प प्रस्तुत किया था। विधि विभाग मेरे अधीन था। और इस कारण वह संकल्प मेरे विभाग के अंतर्गत आता था। अतः मुझे मंत्रिमंडल के अन्य सदस्यों से परामर्श करना था कि संकल्प का क्या उत्तर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि अच्छा तो यही होगा कि आप इस संकल्प को प्रधानमंत्री अथवा स्व. सरदार वल्लभभाई पटेल को हस्तांतरित कर दें जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि उस संकल्प का उत्तर दिये जाने की जिम्मेदारी मुझ पर पड़े। फिर संकल्प के प्रस्तावक और काँग्रेस उच्च कमान में तय हो गया कि यद्यपि वे उस संकल्प को व्यापक तौर पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। जिससे वह उस समय विद्यमान सभी बहुभाषी प्रान्तों पर लागू हो फिर भी वे आंध्र प्रांत बनाने पर विचार करने के लिए तैयार थे। प्रारूपण समिति के सदस्य यह जानने के लिये प्रतीक्षा कर रहे थे कि क्या वे राज्यों की अनुसूची में आंध्र को पृथक राज्य के रूप में दर्ज करें। इस बात को विशेष रूप से जानने वाले माननीय सदस्य, प्रारूपण समिति की रिपोर्ट के पहले प्रारूप की पाद टिप्पणी में देखेंगे कि मैंने प्रधानमंत्री से पूछा था कि वह मुझे बताएं कि क्या आंध्र को संविधान की अनुसूची में दर्ज किया जाना चाहिए। मुझे कोई उत्तर नहीं मिला था जिसके परिणामस्वरूप उस समय आंध्र पृथक प्रांत नहीं बना। मेरे लिए यह हैरानी की बात थी कि एक पार्टी जो लगभग 20 वर्षों तक भाषायी प्रांतों के सिद्धांत को मानती रही, वह 20 वर्ष के बाद उससे हट गई। निश्चय ही, 20 वर्ष की अवधि, चाहे कोई व्यक्ति कितना ही नासमझ क्यों न हो, किसी मामले पर विचार करने के लिये बहुत लंबा समय होता है और वह कोई स्पष्ट निष्कर्ष निकाल सकता है कि क्या वर्ष 1921 में अपनाया गया सिद्धांत का संपादन कुछ फेर-बदल करके किया जाना चाहिए। इसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 1949 से लेकर अब तक सरकार का दृष्टिकोण अनिश्चयपूर्ण रहा है। वह एक बार कहती है कि भाषायी प्रांत नहीं बनाए जाएंगे और दूसरी बार कहती है कि ‘‘हाँ, हम आंध्र प्रदेश बनाएंगे’’ और जब तक आध्र प्रदेश बनाने के लिए एक माननीय व्यक्ति ने अपना जीवन बलिदान नहीं कर दिया, सरकार ने इस विषय पर कोई ठोस कार्यवाही