318 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
करना उचित नहीं समझा। मुझे इस बात की कोई जानकारी नहीं है और मैं सरकार की अनुचित आलोचना नहीं करना चाहता लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि यदि किसी दूसरे देश में किसी सिद्धांत को जिसे पहले स्वीकार कर लिया गया हो, आश्रय लेने के लिये एक व्यक्ति को अपने जीवन का बलिदान करना पड़ता तो सरकार की क्या स्थिति होगी। यह बिल्कुल संभव है कि ऐसी सरकार का अंत कर दिया जाता। परंतु हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं हुआ। सरकार इस प्रस्ताव से खिलवाड़ कर रही है।
सरकार का तर्क यह है कि यदि भाषायी प्रांत बनाए जाते हैं तो इससे भारत की एकता समाप्त हो जाएगी। सरकार के प्रत्येक सदस्य द्वारा यह तर्क बारंबार दोहराया गया है। महोदय, मुझे इस तर्क का प्रयोग किए जाने पर हैरानगी होती है। यदि कोई व्यक्ति संविधान से संबंद्ध राज्यों की अनुसूची को देखे तो उसे पता चलेगा कि विभिन्न भागों-भाग क, भाग ख और भाग ग में कुल मिलाकर 27 राज्यों का उल्लेख है। अभी मैंने भाग घ का उल्लेख नहीं किया। अब आप यदि इन 27 राज्यों पर ध्यान पर ध्यान दें तो पता चलेगा कि इनमें से 23 भाषायी राज्य हैं। केवल 4 राज्य बहु-भाषी हैं। मैं अपने माननीय मित्र, गृह मंत्री से पूछना चाहूँगा कि वह सोचते हैं कि क्या 23 भाषायी राज्यों ने जो संविधान के प्रारंभ से विद्यमान हैं, इस देश की एकता को भंग करने के लिए किसी प्रकार की कोई हरकत की है। वह मेरे प्रश्न का उत्तर दें। ये 23 भाषायी राज्य भारत की एकता को भंग नहीं कर सके। भारत की एकता बनाए रखने की चिंता मुझे भी उतनी ही है, जितनी उनको है और मैं ऐसी किसी व्यवस्था का समर्थन नहीं करूंगा जिससे इस देश की एकता भंग होती है।
हमने परमात्मा की कृपा से, स्वतंत्रता ही प्राप्त नहीं की, बल्कि हमने एकता भी हासिल की है और यह हमारा पहला कर्तव्य है कि हम चाहे किसी भी पार्टी के हों, हम देखें कि इस स्वतंत्रता और एकता को कायम रखा जाए। किंतु इस तथ्य को ध्यान में रखकर जबकि पहले से 23 भाषायी राज्य विद्यमान हैं यह कहना कि भाषायी राज्यों से भारत की एकता खंडित हो जाएगी, बहुत ही हल्की बात लगती है। भाषायी राज्य बनाने की रीति का अनुसरण न करने की दलील के समर्थन में सरकार को कुछ ठोस तर्क प्रस्तुत करने चाहिए।
महोदय, अब, आंध्र के लोगों पर आते हैं जिन्हें बहुत देर के बाद सरकार द्वारा यह शुभकामना दी गई है, इससे उन्हें क्या मिला है? सबसे पहले जैसा कि मैंने विधेयक को पढ़ा है, उसमें इस नए राज्य आंध्र की राजधानी का कोई उल्लेख नहीं है। राजधानी राज्य की जीवन-दायिनी शक्ति होती है। राजधानी के बिना किसी राज्य का अस्त्तिव ही क्या रह जाता है। वास्तव में राजधानी ही राज्य की मूल होती है। इसका कोई उल्लेख ही नहीं किया गया है। राजधानी कौन बनाएगा। क्या नए आंध्र राज्य के विधानमंडल