46. आंध्र राज्य विधेयक 1953 - Page 339

322 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की है? मेरे लिये सबसे अधिक खेद की बात यह है कि गृह मंत्री, जिसका काम यह सुनिश्चित करना है कि बहुसंख्यक वर्ग के अत्याचार से प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा की जाए, एक ऐसा विधेयक यहाँ पर लाए हैं, जिसमें इस बात की कोई संकल्पना नहीं है कि राज्य का स्वरूप क्या होगा और लाखों लोगों का भविष्य क्या होगा। महोदय, मुझे पता है कि उनका जन्म ऊंचे घराने में हुआ है।

डॉ. के. एन. काटजू : कौन? मैं? मैंने साधारण रूप से अपना जीवन आरंभ किया था।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : परन्तु सच तो यह है कि वह कश्मीरी पंडित है। चाहे वह भंगी का भी व्यवसाय करें, वह फिर भी कश्मीरी पंडित ही रहेंगे उनको कभी कष्ट नहीं होगा। सभी लोग उनके पुरखों के कारण, उच्च कुल में जन्म के कारण, उनकी शिक्षा-दीक्षा के कारण, उनका सम्मान करेंगे। प्रश्न तो हमारे बारे में है, जिनको गत 2000 वर्षों से अत्याचार सहने पड़ रहे हैं?

श्री एच. पी. सक्सेना (उत्तर प्रदेश) : परन्तु हम सब आपका सम्मान करते हैं।

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डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : संभव है दस वर्ष के अंतर्गत मेरी मृत्यु हो जाए। महोदय, मेरे ध्यान में तीन बातें हैं जो मैं अपने माननीय मित्र गृहमंत्री के विचारार्थ रखना चाहता हूँ। यदि वह चाहें तो अब भी सदन में समय है।

श्री के. एस. हेगड़े : क्या यह सुझाव दिया गया है कि आंध्र में बिल्कुल भिन्न परंपरा अपनाई जानी चाहिए।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं यह सुझाव देने वाला हूँ। मैं उनको बताना चाहता हूँ कि उन्होंने इस विषय पर ध्यान नहीं दिया है।

श्री के. एस. हेगड़े : वह सभी राज्यों पर लागू होगा? डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैंने ऐसा कहा है।

श्री के. एस. हेगड़े : यह सामान्य प्रस्ताव है।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : कृपया एक मिनट प्रतीक्षा कीजिए। सभापति महोदय, आंध्र राज्य बन जाने से हमारी कठिनाइयाँ समाप्त नहीं होंगी। ऐसे अनेक राज्य हैं जो इसी प्रकार की मांगें प्रस्तुत कर रहे हैं, इसलिए मेरे विचार में सरकार के लिए यह पता लगाना आवश्यक है कि क्या कोई ऐसे तरीके हैं जिनसे बहुभाषी राज्यों को यथात्त रखा जाए और ऐसी भावनाएं और दोष न पनपने दिये जाएं जिनसे कुछ मामलों में भाषायी राज्य बनाने की मांग पैदा होती है। मैं इस मामले पर ध्यान देता रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि यह बहुत महत्वपूर्ण मामला बन सकता है। महोदय,