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मेरा सुझाव दोहरा है। जहाँ कहीं बहुभाषी राज्य हैं, मैं चाहता हूँ वहाँं के राज्यपाल को उस राज्य के अल्पसंख्यकों की रक्षा करने के लिए कुछ विशेष शक्तियाँ प्रदान की जाएं। यह एक प्रस्ताव है जो मैं सरकार के विचारार्थ प्रस्तुत करना चाहता हूँ। मैं इस संबंध में कुछ अधिकृत बाते कहना चाहता हूँ, ताकि वे यह न समझें कि यह मेरी कोरी कल्पना है। मैं कुछ संवैधानिक पूर्वोदाहरण प्रस्तुत करना चाहता हूँ। दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि ऐसे सभी राज्यों में जहाँ बहु-भाषी लोग रहते हैं, आपको वहाँ पर विभिन्न भाषा वर्गों से संबंधित सदस्यों की समितियाँ बनानी चाहिएं जिनको सुनवाई करने और मंत्रालय से पूछताछ करने का अधिकार हो कि क्या उनकी समस्याओं से निपटने के लिए न्याय किया जा रहा है, यदि ये तीन काम किए जाएं तो मेरे विचार में, हम राज्यों को यथावत रख सकेंगे। कम से कम प्रथम अवस्था में तो ऐसा कर सकेंगे। अंत्तोगत्वा, यदि हम इस नतीजे पर पहुंचे कि इन उपायों के साथ भी सफल नहीं हो पाएं तो विधि का विधान मानना पड़ेगा अर्थात् भाषायी राज्य बनाने पड़ेंगे। महोदय, भाषायी राज्य बनाने के मामले में मेरे विचार में दो बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है। एक बात यह है कि भाषायी राज्य को सक्षम होना चाहिए। संभव है कि कोई राज्य छोटा हो, उसकी अपनी संस्कृति हो, उसकी अपनी भाषा हो, उसकी अपनी भावनाएँ हों और अपना नाम हो। फिर भी वह इतना छोटा है कि उसके पास प्रशासन चलाने के लिए साधन उपलब्ध न हों। लोग संस्कृति व भाषा के सहारे जीवित नहीं रह सकते, लोग संसाधनों के सहारे जीवित रहते हैं जो उनके राज्य में उपलब्ध होते हैं; परंतु यदि परमात्मा ने उनको संस्कृति दी है भाषा दी है किंतु संसाधन नहीं दिए हैं तो, मेरे विचार में, वे पृथक भाषायी राज्य का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकते। दूसरी बात यह है कि केवल हमारे देश में ही भाषायी प्रांत बनने में कठिनाइयाँ आती हैं। मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि स्विटजरलैंड में ऐसी कठिनाइयाँ क्यों नहीं हैं यद्यपि स्विटरलैंड स्वयं बहुभाषी राष्ट्र है। केंटन्स में फ्रांसीसी, जर्मन और इटेलियन हैं। फिर भी वह बहुत प्रसन्न राष्ट्र है और वह सर्वाधिक खुशहाल देश है स्विटजरलैंड में कोई प्रांत न होने के क्या कारण हैं, जबकि वह बहुभाषी देश है? इसका जो उत्तर मैं दे सकता हूँ वह यह है कि स्विटजरलैंड में भाषावाद संप्रदायवाद से बोझल नहीं है। हमारे देश में, भाषावाद संप्रदायवाद का ही दूसरा नाम है। जब आप भाषायी प्रांत बनाते हैं तो क्या होता है, आप प्रशासन की बागडोर एक समुदाय के हवाले कर देते हैं, जो बहुसंख्यक समुदाय होता है, और मैं ऐसे कई प्रांतों के नाम बता सकता हूँ, जहाँ यह सब कुछ होने की संभावना है। वह समुदाय अपनी भावना को पवित्र मान कर और महत्वकांक्षी होकर सब से घटिया किस्म के संप्रदायवाद को बढ़ावा देने लगता है जिसको अन्यथा भेदभाव पूर्ण व्यवहार कहा जाता है। इसी प्रकार के भेदभाव पूर्ण व्यवहार से अन्याय की घटनाएं होती हैं और बुरी भावनाएं पैदा होती हैं। यदि हमारा भाषावाद संप्रदायवाद से प्रभावित