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ऐसी गलती नहीं दोहराई जाएगी। इसी कारण पुनर्वास वित्त या अन्य निगमों की बाबत इस विधेयक में उल्लेख नहीं किया गया है।
जहाँ तक लंबी सूची का संबंध है जो मेरे माननीय मित्र श्री सिधवा ने अपने संशोधन में दी है, मैं यह कहना चाहता हूँ कि फिर से वही बात लागू होती है। जो सलाह विधि मंत्रालय को प्राप्त हुई थी वह यह थी कि इन सदस्यों को दिए गए भत्ते ऐसे नहीं थे जिसे लाभ या वास्तविक खर्चों से कुछ अधिक के रूप में सम्मिलित किया जा सके। इस प्रकार उस मत की दृष्टि से जो हमने अपनाया है, वे लाभ के पद नहीं हैं, उस प्रवर्ग में ऐसे व्यक्तियों या अधिकारियों को जिनका श्री सिधवा ने संशोधन में हवाला दिया है, सम्मिलित करके हम सूची को बढ़ाना वांछनीय नहीं समझते।
पंडित कुंजरू : क्या मैं इस बात का उल्लेख कर सकता हूँ, वह यह है कि जो भत्ते इन सदस्यों ने प्राप्त किए थे, उस सीमा से अधिक थे, जो मैं समझता हूँ अब वित्त मंत्रालय द्वारा नियत की गई है।
डॉ. अम्बेडकर : ऐसा हो सकता है। किंतु जब विधेयक में यह कहा गया है कि
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इसके अनुसार, कुछ समितियों के सदस्य निर्योग्य हो गए हैं और वह निर्योग्यता दूर की जाएगी तो उस खंड का उचित अर्थान्वयन यह होगा कि समिति का कोई भी अन्य सदस्य निरर्हित नहीं है और इसीलिए विधेयक में इसका कोई हवाला नहीं दिया गया है।
इसके पश्चात् उस व्यापक प्रतिपादन के संबंध में विचार जिसे मेरे मित्र श्री सिधवा ने अपने वित्तीय संशोधन में प्रतिपादित किया है......
पंडित कुंजरू : क्या मेरे माननीय मित्र उसे स्पष्ट करने की कृपा करेंगे कि वे विशेष कारण क्या थे जिनकी वजह से विधेयक में निर्दिष्ट समितियों के सदस्यों को निर्हता के दायित्वाधीन बनाया गया?
डॉ. अम्बेडकर : क्योंकि, उन्हें जो भुगतान किया गया था उसमें लाभ का तत्व
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है।
पंडित कुंजरू : अर्थात् उनके द्वारा प्राप्त भत्ता 20 रुपये से अधिक है।
डॉ. अम्बेडकर : हमने यह सोचा था कि उनके मामले में कुछ संदेह है और
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विधेयक में उस संदेह को दूर करना ईप्सि है।
उस व्यापक प्रतिपादन की बाबत जिसे मेरे मित्र श्री सिधवा ने संशोधन सं. 2 प्रतिपादित किया है कि साधारण नियम होना चाहिए और साधारण नियम लागू हो ताकि इस प्रकार के विधेयकों की और अधिक आवश्यकता न हो। मेरे विचार में यह