326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बता सकता- फिर भी स्कॉटिश लोगों के हितों की देखभाल करने के लिए ब्रिटिश संविधान में स्कॉटलैंड के लिए स्पेशल सैक्रेटरी ऑफ स्टेट की अलग व्यवस्था है। वह लंदन तो अवश्य गए होंगे, मेरे विचार में अनेक बार गए होंगे (माननीय मंत्री ने इशारा करके बताया-तीन बार) तीन बार। निश्चय ही वह पार्लियामेंट स्ट्रीट से गुजरे होंगे, और 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बिल्कुल निकट पीतल का एक बोर्ड ‘स्कॉटिश ऑफिस’ भी देखा होगा। जहाँ पर स्कॉटलैंड के लिए सेक्रेटरी ऑफ स्टेट बैठता है। ब्रिटेन में एक यह व्यवस्था की गई है। उन्होंने यह नहीं कहा, जैसे कि मेरे मित्रों ने कहा है कि ऐसा करना संप्रदायवाद को मान्यता देना होगा। क्या उन्होंने कोई ऐसी बात की? स्कॉटलैंड कई दो सौ साल पहले इंग्लैंड से मिला था और इसके बावजूद ब्रिटिश लोगों ने स्कॉटिश लोगों की भावनाओं का आदर करने के लिए सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर स्कॉटलैंड का एक सांविधिक पद बना दिया है।
इस संबंध में, मैं दूसरी बात यह कहना चाहता हूँ कि ब्रिटिश संसद में दो समितियाँ हैं। एक समिति वेल्स और मनमौथशायर के लिए है और दूसरी स्कॉटलैंड के लिए है जिसमें स्कॉटिश सदस्य हैं। स्कॉटलैंड से संबंधित सभी विधेयक स्कॉटिश समिति के पास भेजने होते हैं जिससे स्कॉटिश सदस्यों को अपने विचार व्यक्त करने का पूरा अवसर मिल सके। इसी प्रकार, वेल्स तथा मनमौथशायर के सदस्यों को भी समितियों में शामिल किया जाता है जब उनसे संबंधित किन्हीं मामलों पर विचार किया जाता है। छोटे समुदायों व ग्रुपों की भावनाओं को संतुष्ट करके, जिनको इस बात की आशंका रहती है कि बहुसंख्यक वर्ग उनके साथ अन्याय कर सकता है, ब्रिटिश संसद काम करती है। महोदय, मेरे मित्र मुझसे कहते हैं कि मैंने संविधान बनाया है। परंतु मैं यह कहने के लिए तैयार हूँ कि मैं इसे जलाने वाला पहला व्यक्ति होऊंगा। मैं इसे बिल्कुल नहीं चाहता। यह किसी भी व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं है। परंतु वह जो कुछ भी है, यदि हमारे लोग इसका अनुसरण करना चाहते हैं तो उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि बहुसंख्यक वर्ग भी है और अल्पसंख्यक वर्ग भी है और वे यह कहकर अल्पसंख्यकों की उपेक्षा नहीं कर सकते ‘‘ओह नहीं, आपको मान्यता देना लोकतंत्र को हानि पहुंचाना है।’’ मैं कहना चाहता हूँं कि अल्पसंख्यकों को दुख पहुंचाने से अधिक अहित होगा। कभी-कभी मुझे इस बात की आशंका होती है कि यदि अल्पसंख्यकों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया गया जैसे कि हमारे बम्बई राज्य में किया जा रहा है- मैं संकीर्ण नहीं बनना चाहता, परंतु मेरे मित्र मुझे बताते रहते हैं, क्योंकि मैं वहाँ पर नहीं रहता, और मैं अपने राज्य में कोई रुचि नहीं रखता जैसा कि आप जानते हैं और मैं स्वयं महाराष्ट्रियन कहलवाना भी नहीं चाहता- मुझे पता नहीं कि इसका अंजाम क्या होगा। मैं हिंदी भाषा को बहुत चाहता हूँ किंतु समस्या यह है कि हिंदी भाषा भाषी लोग ही हिंदी के सबसे बड़े दुश्मन हैं।