47. संपदा शुल्क विधेयक, 1953 - Page 347

330 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अदा करेगा; यदि कोई अन्य है, तो वह अन्य व्यक्ति अदा करेगा। फिर भी प्रश्न यह है कि नियंत्रक को किस प्रकार पता चलेगा कि मृत व्यक्ति का हिस्सा अमुक नियंत्रित कंपनी में था और उसकी दूसरी भी संपत्ति है? मेरे विचार में विधेयक में ऐसा खंड होना चाहिए था जिसका मैं उल्लेख करने जा रहा हूँ। प्रत्येक उत्तराधिकारी को, चाहे मृत व्यक्ति ने वसीयत छोड़ी हो या नहीं, न्यायालय में जाना चाहिए और छोड़ी गई संपत्ति की घोषणा करनी चाहिए ताकि नियंत्रक को उस घोषणा से पता चल सके कि कितनी संपत्ति छोड़ी गई है। फिर वह इस बात का पता लगाने के लिये आगे कार्यवाही कर सकता है कि क्या कोई ऐसी सम्पत्ति है जो मृत व्यक्ति द्वारा छोड़ी गई हो और जिसे छिपाया गया हो। अन्यथा नियंत्रक लक्ष्यहीन पूछताछ करता रहेगा कि वह कितने मूल्य की सम्पत्ति छोड़ गया है। विद्यमान परिस्थितियों में जिनमें भ्रष्टाचार का बोलबाला है, मुझे बहुत संदेह है कि इस प्रकार के कानून के अंतर्गत सारा मामला नियंत्रक के हाथों में छोड़ने से आज से भी अधिक भ्रष्टाचार नहीं बढ़ेगा। मैं चाहता हूँ कि इन दो पहलुओं में सुधार किया जाए जिससे इस कानून के कारण होने वाली कठोरता-और प्रत्येक कानून कठोर होता है, से इस शुल्क के अदा करने वाले लोगों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

मैं सभा का ध्यान एक अन्य प्रश्न की ओर दिलाना चाहता हूँ जो उस राशि के बारे में है जो संपदा शुल्क से प्राप्त होने की संभावना है। मैं माननीय सदस्य के भाषणों को, जो वह समय-समय पर संपदा शुल्क विधेयक के संबंध में देते रहे हैं, सुनता रहा हूँ और मैंने देखा है कि वह बहुत ही सजग रहे हैं और उन्होंने कोई विशिष्ट आंकड़े नहीं बताए। मेरा विचार है कि पिछली बार जब उन्होंने वर्ष 1952 में विधेयक पुरःस्थापित किया था, उन्होंने सदन को बताया था कि वह इस बात का अनुमान लगाने में असमर्थ है कि इस कर से कितनी धनराशि वसूल होगी। मेरे विचार में इस प्रकार के कानून के संबंध में, जो इतने व्यापक क्षेत्र पर लागू किया जाता हो, माननीय वित्त मंत्री को कम से कम आंकड़ों का अनुमान तो लगाना चाहिए अथवा कम से कम राजस्व बोर्ड से कुछ जांच करने के लिये कहना चाहिए जो उनको कुछ अनुमान बताए कि क्या कर की राशि उनके द्वारा किए जा रहे परिश्रम के अनुरूप होगी। मैंने राजस्व बोर्ड की रिपोर्ट को पढ़ा है और पाया है कि उसमें कुछ आंकड़ें उपलब्ध हैं जिनको वित्त विभाग हमें बताने के लिये उपयोग कर सकता था। अब शुल्क की दरें निश्चित कर दी गई हैं और विधेयक के साथ संलग्न हैं जिनसे पता चल जाता है कि इस शुल्क से क्या प्राप्ति होने वाली है। इस में यह भी बताया गया है कि भारत में संयुक्त परिवारों की कुल संख्या कितनी है। इससे इतना ही पता नहीं चलता कि संयुक्त परिवारों से कुल कितना आयकर वसूल हुआ बल्कि, ऐसे संयुक्त परिवारों की कुल संख्या का भी उल्लेख है जिनका कर-निर्धारण किया