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जो सर जेरेमी रायसमैन के स्थान पर आए, ने एक विधेयक पुरःस्थापित किया। वर्ष 1946 के विधेयक में विचित्र बात यह थी कि काँग्रेस और मुस्लिम लीग- दोनों ने उसका विरोध किया था। काँग्रेस जनों ने कहा था ‘‘आपको सम्पदा शुल्क जैसा कोई कर लगाने का कोई अधिकार नहीं है।’’ और मुस्लिम लीग ने कहा था, ‘‘यदि आप ऐसा कोई कर लगाएंगे तो आप हमारे ‘वक्फ’ में हस्तक्षेप करेंगे, जोकि एक न्यास है और जो आंशिक रूप से खुदा के लिए है और आंशिक रूप से इंसान के लिए है।’’ इस प्रकार, सरकार काँग्रेस अथवा मुस्लिम लीग किसी से समर्थन न मिलने के कारण उस विधेयक के बारे में आगे कुछ न कर सकी और उसका परित्याग कर दिया गया। तत्पश्चात् वर्ष 1948 में श्री षण्मुखम चेट्टी ने पुनः इस मामले को उठाया और एक अन्य विधेयक पुरःस्थापित किया। विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजा गया और प्रवर समिति का विचार था कि जब तक देश में मिताक्षरा कानून लागू है- और वह इस देश के बहुत बड़े भू-भाग पर लागू है, तक संपदा शुल्क विधेयक का कोई लाभ नहीं होगा। इसका परिणाम यह हुआ कि उसको वापिस ले लिया गया-अथवा उसका परित्याग कर दिया गया। श्री षण्मुखम चेट्टी के स्थान पर डॉ. जॉन मथाई आए और उन्होंने धनराशि बनाने पर बहुत जोर दिया, प्रवर समिति का पुनः सत्र बुलाया और उनके सामने पुनः वह विधेयक रखा और प्रवर समिति का निर्णय प्राप्त किया कि इस बात के होते हुए भी कि हिंदू संहिता विधेयक गत चार वर्षों से अनिर्णीत पड़ा है और कोई नहीं जानता कि वह कितने समय तक ऐसे ही पड़ा रहेगा-स्थायी रूप से तथा शाश्वत रूप से-और मेरे सिवाय इसके लिये किसी को कोई दुःख नहीं है......
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नहीं है बल्कि अन्य सदस्यों को भी खेद है।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं जानता हूँ कि महिला सदस्यों का काफ़ी सहयोग रहा है। मैं कहना चाहूँगा कि पिछली बार जब मैं काफ़ी परेशान था, मैंने कुछ महिला सदस्यों को बुलाया-मेरा अभिप्राय स्थूलकाय महिलाओं से है-और मैंने उनको सुझाव दिया कि यदि उनमें से कोई एक आमरण अनशन की धमकी दें तो हम शायद हिंदू संहिता विधेयक को पास करवा सकें। महोदय, मैं बताता हूँ.............
माननीय अध्यक्ष : डॉ. अम्बेडकर, आप सत्याग्रह को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : जी, हाँ, कभी-कभी यह उपयोग सिद्ध होता है। यदि इससे विधेयक पास न भी होता, तो भी निश्चय ही उनका वजन तो कम हो जाएगा और उनके स्वास्थ्य में पर्याप्त सुधार हो जाएगा। यह स्थिति थी। वर्ष 1949 में डॉ. मथाई ने उनका निर्णय प्राप्त किया। प्रवर समिति का दूसरा प्रतिवेदन आया और