334 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उसमें लिखा था ‘‘हिंदू संहिता विधेयक की चिंता न करो। आओ हम संपदा शुल्क विधेयक पर विचार करें,’’ परन्तु तीन वर्ष तक टिप्पण (नोट) लिखे जाते रहे। हम नहीं जानते, क्यों। वर्ष 1952 तक वित्त विभाग की फाइल में वह विधेयक पड़ा रहा और माननीय मित्र को, शायद कार्यालय की सफाई करते हुए कहीं पर उसकी एक प्रति मिल गई। उन्होंने क्या किया? यह बहुत रोचक बात है। प्रवर समिति ने कहा था कि कोई उपयुक्त संशोधन लाकर हम मिताक्षरा के कानून की कठिनाई दूर कर लेंगे। मेरे माननीय मित्रों ने उस कठिनाई को दूर करने के लिए कुछ प्रयास किया था और उन्होंने मिताक्षरा कानून को लगभग हटाकर उस कठिनाई को दूर कर लिया है। खंड 7 में कहा गया है कि यदि 18 वर्ष से कम आयु वाला व्यक्ति मर जाता है तो उस मामले में संपदा शुल्क नहीं लगेगा परंतु यदि कोई सहभागी ऐसी स्थिति में मरता है जिसमें हम उसको हिंदू विधान के अंतर्गत एकमात्र जीवित सहभागी करार देते हैं, तब संपदा शुल्क लगाया जा सकता है। महोदय, यदि मेरे माननीय मित्र इस गोलमोल तरीके से मिताक्षरा विधि को समाप्त कर सकते हैं तो क्या वह हिम्मत करके एक अन्य विधेयक लाकर अथवा अपने साथी विधि मंत्री को एक अन्य विधेयक लाने की प्रेरणा देकर यह नहीं कह सकते कि मिताक्षरा विधि को समाप्त किया जाता है? अतः महोदय, ये कुछ बातें थीं जो मैं आपके ध्यान में लाना चाहता था। मिताक्षरा विधि सांकेतिक तौर पर समाप्त है क्योंकि मिताक्षरा विधि में संपत्ति किसी के हाथ में जाने जैसी कोई बात नहीं है क्योंकि जन्म से ही सम्पत्ति पर उसका अधिकार होता है। सम्पत्ति पर उसका अधिकार होता है। सम्पत्ति का किसी के हाथ में जाने का कोई प्रश्न ही नहीं हैं यह ग़लत विचार है। मुझे पता नहीं कि किसने उनको यह बात बताई है। मिताक्षरा विधि के अनुसार सम्पत्ति किसके हाथ में नहीं जाती। जैसे ही किसी बालक का जन्म होता है, संपत्ति उसकी हो जाती है और पिता का हिस्सा कम हो जाता है। इसलिए पिता की मृत्यु हो जाने पर क्या चीज़ किसके हाथ जाती है? कुछ भी नहीं। जैसे ही बेटा पैदा होता है, पिता का हिस्सा प्रभावित होता है। मान लीजिए, उसका दूसरा बेटा पैदा होता है, जैसे कि उसकी संभावना होती है और पहला बालक इतना अभागा होता है कि उसका भाई आ जाता है, तो हिस्सा और भी कम हो जाता है।
महोदय, मुझे बताया गया है कि विश्व में लगभग 44 देश ऐसे हैं जिनमें इस प्रकार का अर्थात् संपदा शुल्क कानून पास किया गया है। मेरे पास उनकी सूची नहीं है। परंतु मुझे विश्वास है कि दक्षिण एशियाई देशों में से बहुत कम देशों ने ऐसा कानून बनाया है। उनके पास कुछ भी नहीं है। जैसे कि समिति के प्रतिवेदन में दर्शाया गया है, उनके पास कुछ छोड़ जाने योग्य है ही नहीं। हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि ‘‘संचय कैसे किया जाए?’’ हम पूंजीपतियों से घृणा करते हैं और मैं भी करता हूँ। मैं सारी आयु परेल में, इम्प्रूवमैंट ट्रस्ट की चॉल, कमरा संख्या 50