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में रहा हूँ। यदि लोग वहाँ जाएं तो हम मिल सकते हैं। मैं पहले अपने कमरे के लिये 3 रुपये 8 आने किराया देता था और मैंने आज भी उसे आपात स्थिति के लिए रखा हुआ है, इसलिए कि कहीं मुझे वापिस जाने के लिए कह दिया जाए। इसलिये मैं पूंजीपतियों का बहुत बड़ा समर्थक नहीं हूँ परन्तु, मैं सोचता हूँ हमको इस देश में पूंजी और पूंजी में अंतर को समझना चाहिए। यदि आप उनसे पूंजी लेना चाहते हैं तो ले लें। रूस की प्रणाली अपना लीजिए और उसी के अनुसार काम कीजिए। मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि आपको कुछ अंतर रखना चाहिए। अपने उत्साह में-जो बहुत अच्छी बात है-मुझे इस बात की आशंका है कि वे अपने होश खो बैठे हैं क्योंकि कुछ अन्य देशों ने कुछ किया है। परन्तु भारत निश्चय ही यूरोप नहीं है। मैं अनेक बार यूरोप गया हूँ। मैं भारत और यूरोप के बीच अंतर को सहज ही समझ सकता हूँ। जो यूरोप के लिये अच्छा है, वह निश्चय ही भारत के लिये अच्छा नहीं हो सकता। हमें अभी उस स्तर तक पहुंचना है जिस स्तर पर यूरोप पहुँच चुका है अर्थात् आराम का ज्ञतर, समानता के व्यवहार का जीवन स्तर, शिक्षा का स्तर, आदि। हमें इन सब बातों की आवश्यकता है। इस सबके लिए हमको धन चाहिए। अंग्रेजों का उदाहरण लीजिए। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी प्रगति देखिए। वर्ष 1860 में उनके यहाँ अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा थी, जबकि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी 11वीं या 12वीं शताब्दी में स्थापित हो चुकी थी। इसलिए हम जो कुछ कर रहे हैं, हमें सोच-समझ कर करना चाहिए। निःसंदेह हमारा उत्साह अपनी जगह ठीक है। यह अच्छी बात है कि हम जनता की बेहतरी करें किन्तु हम ऐसा करते हुए हम जो साधन अपनाएं हमें उन साधनों पर भी सावधान रहना चाहिए, बस मुझे इतना ही कहना है।
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* डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बंबई) : सभापति महोदय, विदेश नीति पर इस
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वाद-विवाद में कुछ अधिक नहीं किया जा सकता, अधिक से अधिक उन सिद्धांतों पर चर्चा की जा सकती है जिन पर सरकार की विदेशी नीति आधारित है। इससे अधिक कुछ कहने का समय भी नहीं है। निःसंदेह, सिद्धांत बहुमूल्य होते हैं। किंतु मेरा मानना है कि राजनीतिज्ञ विशेषकर विदेशी नीति के मामलों से निपटने वाले सिद्धांतों को पसंद नहीं करते। वे सब मामलों से तदर्थ आधार पर निपटना चाहते हैं, वे अंतर्निहित सिद्धांत की परवाह नहीं करते।
मुझे स्मरण है कि, विश्व युद्ध के पश्चात् फ्रांस की सामरिक शंकाओं को दूर
* संसदीय वाद-विवाद (राज्य सभा), खंड- 7, क, 26 अगस्त, 1954, पृ. 469-93