48. अंतर्राष्ट्रीय स्थिति - Page 353

336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करने के लिए फ्रांस को कुछ भूभाग देने के विचार से जर्मनी के कुछ राज्य-क्षेत्रों के बीच विभाजन रेखा खींचने हेतु निर्णय के लिये श्री लायड जार्ज और श्री क्लीमनसियु वर्सेलीस संधि से पूर्व जब पेरिस में एक होटल में मिले तो उनके पास एक लंबा चौड़ा नक्शा था जो पूरे कमरे में फैला हुआ था तब श्री लायडजार्ज और श्री क्लीमनसियु उसको नज़दीक से देखकर ठीक स्थान पर पता लगाने के लिये उस पर पेट के बल पड़े हुए थे कि कहाँ पर रेखा खींची जाए। काफी जांच-पड़ताल के बाद उन्होंने एक रेखा खींची जो निःसंदेह, फ्रांस के लिए बहुत उपयुक्त थी। तत्पश्चात् श्री लॉयड जार्ज ने श्री निकल्सन को, जो उनके विदेश कार्यालय से विशेषज्ञ के रूप में उनके साथ गये थे, बुलाया और उनके द्वारा खींची गई रेखा के बारे में राय बताने को कहा (श्री निकल्सन भौंचक्के रह गए और बोले, ‘‘ओह, यह तो बहुत गलत हुआ, बहुत गलत हुआ। नैतिक रूप में इसका बचाव बिल्कुल नहीं किया जा सकता।’’ ये दोनों राजमर्मज्ञ तत्काल पीछे मुड़े और अपनी टांगों को हवा में उछालते हुए बोले ‘‘श्री निकल्सन, आप हमें इसका कोई बेहतर कारण बता सकते हैं?’’

मुझे स्मरण है कि लगभग वर्ष 1924 में श्री लो, एक महान् कार्टूनिस्ट ने लंदन में ईवनिंग स्टैंडर्ड में एक कार्टून प्रकाशित किया था जिसमें यूरोप के विभिन्न देशों के विदेश मंत्रियों को, जो यूरोपीय समस्याओं के समाधान तलाश रहे थे हैट, लंबे कोट, और धारीदार पैंट पहने एक दूसरे का हाथ पकड़े और नाचते हुए तथा यह कहते हुए दिखाया गया था ‘‘ओह, हमें तो सिद्धांतों रहित शांति दो, हमें सिद्धांतों रहित शांति दो। (पीस विदाउट प्रिंसिपल्स) निःसंदेह उस पर दुनिया हँसी।

मुझे प्रसन्नता है कि हमारे प्रधानमंत्री के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा जा सकता। उनके कुछ सिद्धांत हैं, जिन पर वे चलते हैं। अब इस बाबत निर्णय सदन को करना है कि जिन सिद्धांतों का यह अनुसरण करते हैं क्या वह सुरक्षित रास्ता है और क्या वे मान्य सिद्धांत हैं जिनको अपने देश के भविष्य के लिए आधार रूप में स्वीकार किया जा सकता है। हम केवल इसी प्रश्न पर चर्चा कर सकते हैं। मैं अपने आपको इन्हीं सिद्धांतों तक सीमित रखूंगा।

हमारे प्रधानमंत्री जिन सिद्धांतों पर चल रहे हैं और जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा है, उनकी संख्या मुख्यतः तीन हैं। एक है शांति, दूसरा है साम्यवाद और मुक्त लोकतंत्र के बीच सह-अस्तित्व और तीसरा है ‘‘सिएटो’’ का विरोध। ये तीन सिद्धांत हैं जिन पर हमारी विदेश नीति आधारित है। अब, महोदय, इनकी मान्यता निर्धारित करने और इन सिद्धांतों की पर्याप्ता जांचने के लिये, मेरे विचार में, यह आवश्यक है कि हम अपनी वर्तमान समस्याओं की, जिनसे हम संबंधित हैं और जिनके लिए ये सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं, पृष्ठभूमि को जान लें।

अब, मेरे विचार में, इसकी पृष्ठभूमि और कुछ नहीं है, केवल विश्व में साम्यवाद