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लोगों को बर्बाद करने में लगा है और उनको अपने प्रभुत्व में लाता जा रहा है और उसका कहना है कि वह उनको स्वाधीन करवा रहा है। रूस द्वारा मुक्ति जहाँ तक मैं समझता हूँ, ऐसी है कि उसके बाद में फिर गुलामी है; इस मुक्ति के बाद आज़ादी नहीं है। परंतु बात यही है-और इस बात से मुझे बहुत चिंता है। आप इस प्रकार की शांति से और कुछ नहीं कर रहे बल्कि उस विशाल देश की पिपासा को शांत कर रहे हैं जो प्रतिदिन किसी न किसी देश को हड़प कर लेता है। जब आप उस जाइंट अर्थात् विशाल देश की नियमित रूप से सेवा कर रहे हैं तो मेरे मन में एक प्रश्न उठता है और वह यह कि वह जाइंट एक दिन हमारी ओर मुखतिब होगा और बोलेगा कि मैंने सब देशों पर कब्जा कर लिया है और अब शेष केवल आप ही बचे हैं, तो अब मैं आपको भी अपनी प्रभुता में लेना चाहता हूँ।’’
श्री एच. पी. सक्सेना : ऐसी स्थिति में, हम उस ‘जाइंट’ को ही ‘खा’ जाएंगे।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : हमें अधिक शान नहीं दिखानी चाहिए। अभी किसी
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अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले में हमारी विदेश नीति का परीक्षण नहीं हुआ है और जब कभी ऐसा कोई अवसर आएगा तभी पता चलेगा कि क्या हम स्थिति का स्वयं मुकाबला कर सकते हैं या नहीं। परंतु जो बात मैं कहना चाहता था, वह यह थी कि किसी बड़े देश की सेवा करने का सिद्धांत मुझे अत्यंत अभद्र सिद्धांत लगता है और हम इससे किस प्रकार छुटकारा पा सकते हैं? क्या रूस इस बात के लिए हमारे प्रति कृतज्ञता प्रकट करेगा कि भारत के प्रधानमंत्री और भारतीय संसद ने इंडो-चाइना अथवा कोरिया के विभाजन का समर्थन किया है और क्या वे इस प्रकार का कोई व्यवहार हमारे साथ नहीं करेंगे? मेरे विचार में, भारतवासियों को इस बात को ध्यान में रखना चाहिए और इसको भूलना नहीं चाहिए और न ही इसकी अनदेखी करना चाहिए।
अब दूसरी बात यह है सह-अस्त्तिव की। सह-अस्त्तिव की बात, मेरे विचार में, आश्चर्यचकित करने वाली है जब तक कि यह बहुत ही सीमित अर्थ में न हो। प्रश्न यह है कि क्या साम्यवाद और मुक्त लोकतंत्र एक साथ काम कर सकते हैं? क्या उनका एक-साथ काम करना व्यावहारिक है? क्या यह संभव है कि उनमें परस्पर संघर्ष नहीं होगा? यह सिद्धांत हर प्रकार से बिल्कुल बेहूदा लगता है, क्योंकि साम्यवाद जंगल की आग की तरह है; वह सब कुछ जलाता चला जाता है। यह संभव है कि जो देश साम्यवाद के केंद्रीय बिंदु से बहुत दूर है, सुरक्षित महसूस करें, क्योंकि वह सोच सकते हैं कि जब तक आग उन तक पहुंचेगी, शायद वह बुझ ही जाए या वह उन तक कभी भी न पहुंचे, परंतु उन देशों का क्या होगा जो जंगल की इस आग में घिरे हुए हैं? क्या आपको लगता है कि जो लोग यहाँ रहते हैं, उनका और जंगल की इस आग का एक साथ होने की कोई संभावना है?