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अतः जब संसद समिति नियुक्त करती है या जब संसद यह प्रस्ताव करती है कि संसद के किसी सदस्य को किसी समिति के लिए नियुक्त किया जाता है, तभी संबद्ध सदस्य उठकर प्रधानमंत्री या उस मंत्रालय के प्रभारी मंत्री, जो समिति नियुक्त कर रहा है, से पूछ सकता है कि उसकी स्थिति क्या होगी, वह निरर्हित होगा अथवा नहीं, और वह मंत्री से आश्वासन की माँग कर सकता है या संसद द्वारा समकालीन संकल्प स्वीकृत किए जाने की मांग कर सकता है कि ‘‘इस विशिष्ट समिति में नियुक्त किया गया कोई सदस्य निरर्हित नहीं समझा जाएगा।’’
श्री सोंधी : यदि यह सरकारी समिति है?
डॉ. अम्बेडकर : फिर भी संसद-सदस्यों को अपने आपको अवश्य संरक्षित करना चाहिए और संसद-सदस्य सरकार से यह आश्वासन मांग कर स्वयं को संरक्षित कर सकता है कि अन्य बातें कुछ भी हों, वह निरर्हित नहीं समझा जाएगा। जब ऐसा आश्वासन दिया जाता है तो सरकार प्रत्यक्षतः ऐसे आश्वासन से पीछे नहीं हट सकती है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : अनुच्छेद 102 के अधीन ही संसद यह घोषणा करते
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हुए कि वह पद लाभ का पद नहीं है, विधि पारित करे।
डॉ. अम्बेडकर : विनिर्दिष्ट मामले पर विचार कर रहे हैं। जहाँ तक संसद के साधारण विधि पारित करने की बात है मैं यह नहीं जानता वह साधारण विधि क्या कर सकती है। जहाँ तक मैं कल्पना कर सकता हूँ, उसमें यह कहा जा सकता है कि जब कभी कोई संसद-सदस्य समिति में नियुक्त किया जाता है, उसके सदस्य भत्ता प्राप्त करते हैं जिसे लाभ कहा जा सकता है- उसी मामले में संसद यह कह सकती है, जैसा वे इंग्लैंड में करते हैं कि सदस्य की नियुक्ति लाभ का पद नहीं समझी जाएगी।
श्री कॉमथ : क्या हम एक समान प्रक्रिया निर्धारित नहीं कर सकते?
डॉ. अम्बेडकर : नहीं हो सकती, कारण यह है कि बुनियादी भत्ता बदल सकता है।
श्री कॉमथ : फिर भी हम एक समान प्रक्रिया निर्धारित कर सकते हैं।
डॉ. अम्बेडकर : संसद के लिए ऐसा करना संभव है। मैं यह नहीं जानता कि हमारे पास कितना समय है किंतु आगामी संसद यह कहते हुए एक छोटा अधिनियम पारित कर सकती है कि जब कभी कोई संसद-सदस्य किसी समिति के लिए नियुक्त किया जाता है, जहाँ भत्ते मात्र पारिश्रमिक से अधिक हो सकते हैं और नियुक्ति लाभ का पद माना जा सकता है तब प्रत्येक नियुक्ति के मामले में संसद का अधिनियम