35. संसद निरर्हता निवारण विधेयक - Page 37

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यह कहेगा कि- ‘‘इसे लाभ का पद नहीं माना जाएगा।’’ यह साधारण तरीके से किया जा सकता है।

श्री सिधवा : उन समितियों के बारे में क्या है, जिनमें सदस्य अब 20/- रुपये से अधिक ले रहे हैं? ऐसी कुछ समितियाँ हैं।

डॉ. अम्बेडकर : मेरे पास इसकी कोई धारणा नहीं है।

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श्री सिधवा : उस मुद्दे को स्पष्ट किया जाना है।

डॉ. अम्बेडकर : यदि आप ऐसे मामले हमारे ध्यान में लाएंगे तो हम उनकी

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जाँच करेंगे जहाँ तक हमारे विभाग का संबंध है, हमने सभी मंत्रियों से तमाम सूचना एकत्रित कर ली थी। हमने उनकी जांच की और यह पाया कि ये ऐसे मामले हैं जहाँ भत्ते हमारे द्वारा नियत मानदंड से अधिक थे और इसीलिए संरक्षण आवश्यक था। अन्य मामलों में हमने यह पाया कि भत्ते आधारभूत नियम का अतिवर्तन नहीं करते थे और परिणामस्वरूप ऐसा कोई संकल्प आवश्यक नहीं था।

श्री सिधवा : आपकी क्या सूचना है?

डॉ. अम्बेडकर : आपको हमोरी सूचना स्वीकार करनी चाहिए। इससे प्रभावित

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सदस्यों को यह अभ्यावेदन करना चाहिए कि ‘‘मैं अधिक ले रहा हूँ और मुझे छूट नहीं है।’’

श्री सिधवा : इसे यहाँ क्यों नहीं करते?

डॉ. अम्बेडकर : मैं आपके सुझाव को तत्काल स्वीकार नहीं कर सकता हूँ। आप

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यह स्वीकार करना चाहेंगे कि आपके तथ्य इतने सही नहीं हैं जितने मेरे हो सकते हैं। आपके सुझाव अकेले व्यक्ति के परिश्रम हैं। यहाँ पर सैंकड़ों ने जाँच की है और निश्चित रूप से उनकी सूचना अधिक विश्वसनीय मानी जा सकती है।

मेरे मित्र श्री कॉमथ ने मुझसे असम सरकार के अधिवक्ता की बाबत कुछ पूछा था। ठीक है, मैं नहीं जानता किंतु मुझे इस पर कहना चाहिए। क्या किसी प्रांत में सरकारी अभिवक्ता लाभ का पद धारण करता है या नहीं, ऐसा मामला है जो बहुत पहले विनिश्चित किया गया था। जहाँ तक मुझे याद है, जब भारत सरकार अधिनियम, 1937 में प्रांत में प्रवृत्त हुआ था तब मुझे विश्वास है, कुछ प्रांतों में उनके महाधिवक्ताओं द्वारा यह विनिर्णय दिया गया था कि यह लाभ का पद है। वास्तव में मेरे मस्तिष्क में एक मामला है जहाँ कुछ सरकारी अधिवक्ताओं को इसी आधार पर त्याग-पत्र देना पड़ा था। मैं नहीं जानता कि क्या असम में कोई ऐसा मामला हुआ था। हो सकता है यह हुआ हो, हो सकता है न भी हुआ हो। एक कठोर निर्वचन से यह संकेत मिल सकता है कि जो वकील सरकारी अधिवक्ता है उसे स्थिति से परिचित होना चाहिए।