48. अंतर्राष्ट्रीय स्थिति - Page 360

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डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : अब, एक या दो छोटी-छोटी बातें।

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माननीय सभापति : भाषण समाप्त करने के लिए एक या दो छोटी-छोटी बातें।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : जी हाँ। प्रधानमंत्री पंचशाल के सिद्धांत पर निर्भर

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कर रहे हैं जो श्री माओ द्वारा अपनाया गया है और अनाक्रमण की तिब्बत संधि में लेखबद्ध था। मुझे इस बात पर कुछ हैरानी है कि प्रधानमंत्री पंचशील को बड़ी गंभीरता से ले रहे हैं। महोदय, जैसा कि आप जानते हैं, पंचशाल बौद्ध धर्म का अनिवार्य अंग है और यदि श्री माओ का पंचशील में विश्वास होता है तो वह अपने देश में बौद्धों के साथ, निश्चय ही, बेहतर व्यवहार करते, राजनीति में पंचशील का कोई स्थान नहीं है विशेषकर, साम्यवादी देश की राजनीति में, साम्यवादी देश दो सर्वविदित सिद्धांतों को मानते हैं, जिनपर वे प्रायः अमल करते हैं। एक नैतिकता जो सदा डावांडोल रहती है। कोई नैतिकता नहीं है। आज की नैतिकता कल की नैतिकता नहीं है।

आज की नैतिकता के अनुसार आप अपना वचन निभा सकते हैं और कल उतने ही औचित्य के साथ उस वचन को भंग कर सकते हैं क्योंकि कल की नैतिकता आज से भिन्न होगी, दूसरी बात यह है कि जब रूसी साम्यवादी देश अन्य देशों से कोई लेन-देन करता है तो प्रत्येक सौदा अपने आप में एक पृथक सौदा होता है। जब हम किसी व्यक्ति से कोई लेनदेन करते हैं तो हम सद्भावना से शुरू करते हैं और उनके आभारी होकर समाप्त करते हैं। जब रूसी किसी व्यक्ति के साथ कोई लेनदेन करते हैं तो वे सद्भावना के साथ आरंभ नहीं करते और न ही वे अंत में कोई आभार व्यक्त करते हैं। लेनदेन आरंभ होता है और उसी सीमा के भीतर समाप्त भी हो जाता है। जब स्थिति परिपक्व अवस्था में पहुंचेगी तब प्रधानमंत्री को भी अंत में इसका पता चल जाएगा। वह हमेशा कहते हैं कि एक सिद्धांत है ‘एशिया फ़ॉर एशियाटिक्स।’ हाँ, जहाँ तक उपनिवेशवाद का संबंध है, यह सिद्धांत बिल्कुल सही है। एशिया, एशिया निवासियों के लिये होना ही चाहिए परंतु हम किस प्रकार की स्थिति से जूझ रहे हैं? क्या आज एशिया एक है? किस रूप में? अब एशिया विभाजित है। आधे एशिया में साम्यवाद का बोलबाला है। उनके जीवन के सिद्धांत भिन्न हैं और उनकी सरकार के सिद्धांत भी भिन्न हैं। शेष एशिया के जीवन के सिद्धांत अलग हैं और सरकार के सिद्धांत भी अलग हैं। एशिया निवासियों में एकता कहाँ है? ऐसी बातें करने का क्या लाभ है कि एशिया एशिया निवासियों के लिये है? ऐसी कोई बात नहीं हो सकती। एशिया पहले ही एशिया निवासियों के बीच युद्ध व संघर्ष का अखाड़ा बनता जा रहा है। इसलिये हम स्वाधीनता में विश्वास रखते हैं तो हमें स्वतंत्र राष्ट्रों के साथ मिलकर चलना चाहिए, यही बेहतर होगा।