344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अब मैं गोआ के बारे में कुछ कहना चाहूँगा। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री की गोआ ख़ाली करवाने की नीति बिल्कुल सही है। यह बहुत अच्छी नीति है और सबको उनको समर्थन देना चाहिए। मैं भी उनका समर्थन करता हूँ। लेकिन मैं एक बात कहना चाहता हूँ। यदि मुझे ठीक याद है तो पुर्तगाल द्वारा गोआ ख़ाली करने और भारत को सौंप देने के बारे में मैंने बहुत पहले जब हमने स्वाधीनता प्राप्त की थी, उनसे बातचीत की थी। मेरे पास कुछ टिप्पण हैं जो एक शिष्टमंडल ने उनको प्रस्तुत किए थे, मैं उनका नाम भूल गया हूँ लेकिन वे टिप्पण मेरे पास हैं। परंतु प्रधानमंत्री ने इस पर कोई गंभीर रुचि नहीं दिखाई। मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि, क्योंकि मैं महसूस करता हूँ कि यदि प्रधानमंत्री ने आरंभ में इस मामले में सक्रिय रुचि ली होती, तो मुझे विश्वास है कि गोआ का कब्जा लेने के लिए भारत सरकार द्वारा पुलिस की साधारण कार्यवाही पर्याप्त होती। परंतु वह हमेशा उनके विरुद्ध जोर-जोर से बोलते रहे, कोई कार्यवाही नहीं की। इसका परिण् ाम यह निकला कि जहाँ तक हमारी जानकारी है, पुर्तगालियों ने गोआ में मोर्चाबंदी कर ली है। निःसंदेह, प्रधानमंत्री की जानकारी सही होनी चाहिए और हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि गोआ में अब भी कोई रक्षा व्यवस्था नहीं है, कि वहाँ पर कोई रक्षक सेना नहीं है और पुर्तगाल द्वारा लाई गई कोई सेना नहीं है।
श्री जवाहर लाल नेहरू : मैंने ऐसी कोई बात नहीं कही है।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैंने सोचा, उन्होंने ऐसा कहा था, परंतु जो कुछ भी
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हो, बात यह है कि मेरा निजी विचार यह है कि पर्यवेक्षकों पर चर्चा का कोई महत्व नहीं है और उसका कोई परिणाम भी नहीं निकलेगा। मान लीजिए, पुर्तगाली गोआ निवासियों के साथ सर्वोत्तम व्यवहार करें, तो भी क्या हम गोआ पर अपना दावा छोड़ देंगे? संभव है कि वे उनको डोमिनियन का दर्जा दे दें और उनको पूरे नागरिक बना लें, फिर भी हम गोआ पर अपना दावा नहीं छोड़ेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है। यह भारत का अंग है। इसलिए मेरे विचार में पर्यवेक्षकों के बारे में किसी चर्चा का कोई अर्थ नहीं है। हमको पुर्तगाल की जनता से इस बारे में विचार-विमर्श करना चाहिए। क्या वे अपनी प्रभुसत्ता उसी प्रकार छोड़ने को तैयार हैं जिस प्रकार अंग्रेजों ने छोड़ी है? मेरे विचार में, हमें केवल इस विषय पर चर्चा करनी चाहिए, महोदय, यह दुर्भाग्य की बात है कि कुछ प्रबुद्ध राष्ट्र पुर्तगालियों का साथ दे रहे हैं। मुझे यह जानकर
खेद है कि श्री चर्चिल परोक्ष रूप से पुर्तगाल का पक्ष ले रहे हैं और हमसे कहते हैं कि ‘बल प्रयोग न करों’, क्यों? क्या वे प्रधानमंत्री द्वारा प्यार किए जाने के बाद यहाँ से जाने वाले हैं? और बिना कोई गोली चलाए? यही स्थिति ब्राजील की है और पता नहीं अमरीका का रवैय्या क्या है, क्योंकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से अब तक कुछ नहीं कहा है। हो सकता है, वे भी पुर्तगाल का ही साथ दें। मुझे विस्मय