48. अंतर्राष्ट्रीय स्थिति - Page 363

346 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मुझे खेद है मैं उनकी बात समझ नहीं पाया। उनकी

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बात को समझना मेरे लिए बहुत कठिन है।

माननीय सभापति : उनकी बात को समझना बहुत कठिन है।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं कहना चाहता हूँ कि हम इस मामले में यह जानने

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के अधिक इच्छुक नहीं हैं कि नाममात्र का प्रभुतासम्पन्न कौन है। हम गोआ का कब्जा प्राप्त करने के इच्छुक हैं और वहाँ पर अपनी सरकार का शासन चाहते हैं। हमारे सामने एक मामला है जिसमें हमारे अपने देश में एक अन्य प्रभुत्वसम्पन्न का राज्य क्षेत्र पट्टे पर लिया गया था और कुछ अंलकरणों के साथ भारत का स्थायी अंग बना लिया गया, जो इस बात का द्योतक है कि वहाँ कोई संप्रभु था। मेरे विचार में उसके पुत्र को प्रिंस ऑफ़ बरार बना दिया गया था। यह एक दूसरा तरीका है जिसे शायद प्रधानमंत्री आजमाना चाहें। मुझे इस बात का कोई कारण नहीं दिखाई देता कि प्रधानमंत्री इन दो तरीकों में से एक को अपनाकर पुर्तगाल को राजी करने में सफल क्यों नहीं होंगे।

मैं केवल एक बात कहने के बाद बैठ जाऊंगा। मैं एक दिन चाथम हाउस स्थित ‘इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल अफे़यर्स, (अंतर्राष्ट्रीय कार्य संस्थान) द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक पढ़ रहा था। उसमें किन्हीं मामलों का विश्लेषण किया गया था जिनके कारण दूसरा विश्व युद्ध हुआ था और उसका लेखक, निःसंदेह बहुत ही विद्वान व्यक्ति था। उसने दो निष्कर्ष निकाले थे कि युद्ध क्यों हुआ था और उसे क्यों नहीं टाला जा सका था। एक कारण यह था कि श्री चेम्बरलेन निःशस्त्रीकरण की नीति के कारण, जिसके संबंध में लेबर पार्टी आंदोलन कर रही थी, यूरोप में शक्ति संतुलन को ठीक से कायम नहीं रख सके और हिटलर की शक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही थी और उसको नियंत्रण में रखना कठिन हो गया था। दूसरी बात उन्होंने यह कही थी कि चेम्बरलेन ने हिटलर की बात को सही मानकर सबसे बड़ी गलती की थी। हिटलर से अधिक झूठा व्यक्ति कोई नहीं था। जब चेकोस्लोवाकिया से सूडेटन जर्मन्स् को अलग किया गया था तब हिटलर को, वह जो चाहता था दिया गया था और उसने कहा था कि वह और कुछ नहीं चाहता। पूरे सदन को यह बात याद होगी कि जब उस संधि पर हस्ताक्षर किए गए तो वह दूसरे ही दिन चेकोस्लोवाकिया पहुंच गया। मैं आशा करता हूँ कि हमारे प्रधानमंत्री ऐसी भयानक ग़लतियाँ नहीं करेंगे। महोदय, मैं यहीं समाप्त करता हूँ।

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