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* डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बम्बई) : सभापति महोदय, माननीय प्रधानमंत्री के भाषण से मुझे ऐसा लगता है कि उसमें कुछ आरोपों का जो जनता सरकार के विरुद्ध इस आधार पर लगा सकती है कि उन्होंने पूंजीपतियों का साथ दिया है और श्रमिकों के हितों की अवहेलना की है, खंडन करने पर अधिक ज़ोर दिया गया है। मैं निश्चित ही सरकार के विरुद्ध ऐसे आरोप लगाने वालों में नहीं हूँ। मैं अपने भाषण के अंत में अपना पक्षकथन रखूंगा कि सरकार ने मेरे निर्णय में व्यक्त की गई स्थिति को बिल्कुल ग़लत समझा है और अपने समक्ष रखे गए तथ्यों को भी नहीं समझा। दोपहर 12.00 बजे।
प्रधानमंत्री का पक्षकथन- यदि मैंने उन्हें सही ढंग से समझा है-एक ऐसी महिला की स्थिति से मिलता है जिसने एक अवैध बालक को जन्म दिया हो और जब उससे पूछताछ की गई तो उसने बताया ‘‘महोदय, यह अवैध हो सकता है, लेकिन बहुत ही छोटा बालक है।’’ ठीक है हम मान लें कि इन दो मामलों को अलग किया जा सकता है। यह तथ्य है कि निर्णय अवैध है और दूसरे वह संभवतः बहुत छोटा निर्णय है। हमारा संबंध तो इस बात से है कि निर्णय सही है या नहीं है।
चूंकि समय बहुत कम है, इसलिए विषय-वस्तु पर कुछ बोलने से पूर्व कोई भूमिका बांधना संभव नहीं है। इसलिये मैं सीधे विषय वस्तु पर अपने विचार व्यक्त करता हूँ।
विपक्ष के नेता ने एक मुद्दा उठाया था जो इस प्रकार हैः- क्या श्रम अधिकरण (अपील) अधिनिर्णय में सरकार द्वारा किए गए फेर-बदल न्यायोचित हैं? प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा कि सरकार को ऐसा करने का अधिकार है और मैं उनके विचार से पूरी तरह सहमत हूँ कि सरकार को अधिनिर्णय में फेर-बदल करने का अधिकार होना चाहिए क्योंकि आखि़रकार, सरकार ने, जिसके वह प्रभारी हैं, पूरी जनता के कल्याण की बात सोचनी है, न कि जनता के एक भाग के कल्याण की और उन पर इस बात की पूरी जिम्मेदारी है। अतः यह उनका विधि सम्मत अधिकार है। जैसा कि मैंने पहले कहा था, प्रश्न यह है कि क्या उन्होंने अपने अधिकार का सही
* संसदीय वाद-विवाद (राज्य सभा), खण्ड- 7, क, 2 सितम्बर, 1954, पृ. 1207-16