49. बैंक विवादों के संबंध में सरकारी आदेश - Page 369

352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जिसको आरंभ से अर्थात् सेन समिति से लेकर श्रम अपील अधिकरण तक अपनाया गया है। मैं इस बात को सिद्ध करने के लिये कि यह वर्गीकरण कितना बेहूदा है, एक उद्धरण देना चाहता हूँ। ‘क’ वर्ग के बैंकों को लीजिए। ‘क’ वर्ग के बैंक ऐसे बैंक हैं जिनकी कार्यपूंजी 25 करोड़ रुपये से अधिक है। ऊपरी सीमा निर्धारित नहीं की गयी है। इसमें केवल 25 करोड़ रुपये का उल्लेख है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि अन्य सभी बैंक, जिनकी कार्यपूंजी 100 करोड़ रुपये अथवा 200 करोड़ रुपये हो सकती है, उस बैंक के बराबर हैं जिसकी पूंजी केवल 25 करोड़ रुपये है। ग़लत वर्गीकरण के सुस्पष्ट उदाहरण के रूप में मेरे विचार में इम्पीरियल बैंक का मामला सबसे अधिक उपयुक्त है। मेरे मित्र ने कुछ आंकड़े दिए हैं परंतु मैं कुछ ऐसे आंकड़े देना चाहता हूँ जो मेरे पास हैं और जो बहुत उपयोगी हैं। मेरे विचार में, इसकी पूंजी लगभग 218 करोड़ रुपये है और सभी भारतीय अनुसूचित बैंकों में कुल जमाराशि की कुल 41 प्रतिशत धनराशि इस बैंक में जमा है। अब मैं यह पूछना चाहता हूँ कि क्या 25 करोड़ रुपये की कार्यपूंजी रखने वाले बैंकों को उस बैंक के बराबर दर्जा देना उचित है जिसकी कार्यपूंजी 218 करोड़ है और क्या यह वांछनीय और आवश्यक नहीं था कि सरकार इम्पीरियल बैंक के लिए एक विशेष श्रेणी बनाती।

प्रो. एन. जी. रंगा (आंध्र) : उसका राष्ट्रीयकरण कर देना चाहिए।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मेरे पास सभी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन ऐसे अनेक समूह हैं जो 25 करोड़ रुपये और 218 करोड़ रुपये के बीच में आते हैं और मुझे विश्वास है कि यदि अनेक वर्गीकरण होते तो अधिक कर्मचारियों को वेतन तथा अन्य परिलब्धियों के रूप में अधिक लाभ मिलते क्योंकि उन सबका संबंध लाभ से होता परंतु वित्तमंत्री ने बिना उचित जांच-पड़ताल करवाए इन तीन निकायों द्वारा प्रस्तावित वर्गीकरण को चुपचाप स्वीकार कर लिया है।

माननीय सभापति : अपनी बात को समाप्त कीजिए डॉ. अम्बेडकर, दूसरे वक्ताओं को भी बोलना है।

डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : जी हाँ, महोदय, मैं एक या दो मिनट से अधिक समय नहीं लूंगा। मुझे पता नहीं कि इस बात के क्या कारण हैं कि मेरे माननीय मित्र ने यूनाइटेड बैंक के मामले में जो छूट दी जिसका श्रमजीवी वर्गों पर विपरीति प्रभाव पड़ा, परंतु उन्होंने इम्पीरियल बैंक को अलग प्रवर्ग नहीं बनाया जिससे श्रमजीवी वर्गों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता। निश्चय ही वे एक दूसरे के समकक्ष आ जाते।

वर्गीकरण के इस मुद्दे से एक अन्य बात सामने आती है। इन तीन निकाय में से सेन कमेटी, शास्त्री कमेटी तथा अपील अधिकरण किसी ने भी इस देश में भारतीय बैंकों और विदेशी बैंकों के बीच कोई अंतर रखने की आवश्यकता नहीं समझी। विदेशी बैंकों से मेरा अभिप्राय एक्सचेंज बैंकों से है। शास्त्री अवार्ड से पता चलता है कि इनमें से