354 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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* डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बम्बई) : उप-सभापित महोदय, यह तीसरा प्रतिवेदन है
जो अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयुक्त ने राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया
है। प्रतिवेदन को पढ़ने पर सबसे पहले आयुक्त द्वारा संसद सदस्यों के विरुद्ध
शिकायत की बात सामने आती है। उनका कहना है कि उनके प्रतिवेदन में जिन
विभिन्न मुद्दों का उल्लेख किया गया है, उन पर उनके द्वारा कार्यवाही नहीं की
गई है। उनका कहना है कि संसद सदस्य इस बात को भूल गए हैं कि वह कोई
कार्यवाही अधिकारी नहीं हैं, उनका काम केवल प्रतिवेदन प्रस्तुत करना है। वह जो
सिफारिशें करता है या सुझाव देता है, उनको कार्यरूप देना कार्यकारी विभागों का
काम है। मेरे विचार में, उनका यह कहना बिल्कुल उचित है। यह कोई कार्यकारी
अधिकारी नहीं होता और जो कार्यवाही की गई है उसके लिए गृह मंत्रालय अथवा
भारत सरकार के अन्य विभागों की आलोचना की जानी चाहिए। परंतु आयुक्त
द्वारा की गई आलोचना को सही करार देते हुए मेरे विचार में आयुक्त द्वारा अपने
प्रतिवेदन का प्रारूप तैयार करने और प्रस्तुत करने के लिए ही उन्हीं की आलोचना
की जा सकती है। मैं शिकायतों से संबंधित अध्याय का उल्लेख कर रहा हूँ क्योंकि
मेरे विचार में उस पुस्तक का यह अध्याय अत्यन्त रुचिकर व शिक्षाप्रद होना चाहिए
था। हम सबको इस बात की जानकारी है कि अनुसूचित जातियों के लोग सभी प्रकार
के अत्याचारों, दमन तथा दुर्व्यवहार के शिकार होते हैं और ये सब कुछ गांवों के
लोग करते हैं जिनमें उन्हें रहना होता है। निःसंदेह हम लोग यह जानना चाहते थे
कि उनके साथ प्रतिदिन, किस प्रकार का अत्याचार व दुर्व्यवहार होता है। निःसंदेह,
आयुक्त के प्रतिवेदन में ऐसी शिकायतों का उल्लेख होना चाहिए था और मैं देखता
हूँ कि अनुसूचित जातियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय पर आयुक्त ने बिल्कुल
कुछ नहीं लिखा। मेरे पास जो शिकायतें पहुंची हैं, उनसे पता चलता है और मुझे
विश्वास है कि आयुक्त के पास अनेक शिकायतें, जो एक हजार अथवा पांच सौ
से कम नहीं होती, पहुंची होंगी परंतु मैं एक या दो का उल्लेख करना चाहता हूँ
* संसदीय वाद-विवाद (राज्य सभा), खण्ड- 7 क, 6 सितम्बर, 1954, पृ. 1447-75