355
जिनके बारे में मुझे जानकारी मिली है और जो थोड़े ही समय पहले घटित हुई हैं। मुझे बहुत ही विश्वसनीय सूत्रों ने बताया है कि राजस्थान में तथाकथित डाकुओं ने अनुसूचित जाति के तीस लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी है। वास्तविकता यह है कि राजपूत और स्वर्ण हिंदू यह नहीं चाहते कि राजस्थान में रहने वाले अनुसूचित जाति के लोग उन मूल अधिकारों का लाभ उठाएं, जो उनको अन्य हिन्दुओं के साथ बराबरी का दर्जा प्रदान करते हैं। इन मूल अधिकारों का लाभ उठाने के मामले में उनको भयभीत करने और विचलित करने के लिए स्वर्ण हिन्दुओं ने अपने आपको डाकुओं के एक दस्ते के रूप में संगठित कर लिया है और वे उन चमारों पर गोलियाँ चलाते हैं जो मूल अधिकारों का लाभ उठाते हैं या उठाने का प्रयत्न करते हैं। उनको संरक्षण प्रदान करने के लिए वहाँ पुलिस की टुकडि़याँ भेजी गई हैं परंतु मुझे पता चला कि पुलिस भी डाकुओं के साथ मिली हुई है। पुलिस के पास जो बंदूकें थीं, उनमें से आधी डाकूओं को दे दी गइंर् और रिपोर्ट में यह लिखा गया कि डाकुओं ने पुलिस से बंदूकें छीन लीं। पुलिस ने इन डाकुओं को आधी गोलियाँ भी दे दीं। आधी गोलियाँ चलाई गईं, वह भी संभवतः हवा में चलाई गई होंगी क्योंकि उनसे कोई हताहत नहीं हुआ। इसका परिणाम यह निकला कि डाकू मौज-मस्ती कर रहे हैं। वास्तव में डाकू कोई अन्य लोग नहीं हैं बल्कि वे उसी तरह हैं जैसे अमरीका के दक्षिणी राज्यों में कुक्लेक्स क्लान, गोरों का एक दस्ता जो ऐसे हब्शियों को गोली मारने के लिए तत्पर रहते हैं जो उस समानता के अधिकार का प्रयोग करने का प्रयत्न करते हैं जो उनको गृह युद्ध के पश्चात् प्रदान किया गया था। आयुक्त के प्रतिवेदन में इस घटना का कोई उल्लेख नहीं किया गया है।
मैं एक अन्य घटना का उल्लेख करता हूँ जो बंबई में घटित हुई है। एक भंगी एक गांव में रहता था जिस पर हिंदुओं ने आरोप लगाया कि वह गाँव में कोई बीमारी लाया है। वे समझते थे कि उसके पास दुर्भावनापूर्ण शक्ति है, जो रोग पैदा कर सकती है और वह गांव में फैल गई है। उन्होंने उसको पकड़ लिया और उससे बोले कि वह अपने सिर पर जलती आग को उठाए और गॉंव का चक्कर लगाए जिससे वे बुरी शक्तियाँ जो गांव में बीमारी लाई हैं, वहाँ से चली जाएं। सौभाग्यवश वे इस बात को भूल गए कि उसके सिर पर पगड़ी है और वह भी सिर से पगड़ी उतारना भूल गया। जलती आग और वह बर्तन जिसमें आग रखी थी, इतना अधिक गर्म था कि लगभग आधी
खोपड़ी जल गई। आयुक्त के प्रतिवेदन में इस घटना का भी कोई उल्लेख नहीं है। मुझे हैदराबाद राज्य में, औरंगाबाद जिले में हुई एक घटना याद है जिसमें ग्रामवासियों ने अनुसूचित जाति की एक महिला को पिशाचिनी घोषित कर दिया था और उसको उस गांव में पड़ी किसी महामारी के लिए जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने उससे पूछताछ की। वह अपने आपको निर्दोष प्रमाणित नहीं कर सकी क्योंकि ऐसा करने का कोई साधन नहीं था। इसका परिणाम यह निकला कि उसको मारा-पीटा ही नहीं गया बल्कि