356 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उसका घर भी जला दिया गया। उसके परिवार के सदस्यों पर बुरे-बुरे लांछन लगाए गए। आयुक्त के प्रतिवेदन में इस घटना का भी कोई उल्लेख नहीं है।
मेरे माननीय मित्र, गृह मंत्री, मेरे विचार में, इस बात को स्वीकार करेंगे कि अनुसूचित जाति के लोग अच्छे या बुरे कारण से मुझे और सरकारी अधिकारियों को अपनी शिकायतें भेजते रहते हैं और मेरे पास भी इन अत्याचारों और दमन की घटनाओं की लंबी सूची रहती है। मैं चाहता था कि इस सार्वजनिक दस्तावेज में इनमें से कुछ शिकायतों का उल्लेख किया जाता तो अच्छा होता। परंतु इसमें ऐसा कुछ रिकार्ड नहीं किया गया। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आयुक्त का यह प्रतिवेदन, जहाँ तक शिकायतों के लेखबद्ध करने का संबंध है, किसी के आग्रह पर लिखवाया गया है। संभवतः आयुक्त इस अत्यन्त महत्वपूर्ण उद्देश्य को बिल्कुल भूल गए कि उनका पद बनाए जाने का उद्देश्य क्या है? इसका उद्देश्य यह था कि सर्वण हिंदुओं द्वारा अनुसूचित जाति के लोगों के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार के घिनौने रूप को सामने लाकर जनता की अंतरात्मा को झकझोरा जाए जिससे प्रबुद्ध जन जनता में जाकर उनको, कि क्या इस प्रकार का व्यवहार सभ्य लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। परंतु यदि आप इन तथ्यों को उजागर नहीं करेंगे, जब आप किसी कारणवश उन मामलों को दबा देंगे तो इस पद को बनाए जाने का उद्देश्य विफल हो जाएगा। मैं आशा करता हूँ कि आयुक्त अपने दूसरे प्रतिवेदन को तैयार करते समय इस बात को ध्यान में रखेंगे और उन तथ्यों को प्रस्तुत करने में शर्म महसूस नहीं करेंगे, जो कष्ट झेल रहे जनसमूह व अछूत जन उसको भेजते हैं। आयुक्त द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन के स्वरूप के बारे में यह मेरी पहली टिप्पणी है।
यह बिल्कुल स्पष्ट है कि आयुक्त द्वारा जिन मामलों का हवाला दिया गया है, कानून के उल्लंघन के अनेक मामले हुए हैं और अनुसूचित जातियों पर अनगिनत अत्याचार और दमन की घटनाएं हुई हैं। मेरे विचार में यह मामला गृह मंत्री के विभाग के अंतर्गत आता है। अनुसूचित जातियों के लिए विशेष रूप से और सभी लोगों के लिए सामान्य कानून का पालन कहाँ तक किया गया है और कितने मामलों में कानून का उल्लंघन करने वालों को दंड दिया गया है? महोदय, पहले दिन, जब गृहमंत्री ने सदन में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था, मैं दुर्भाग्यवश उस दिन कुछ विलंब से आया था परंतु उनका भाषण समाप्त होने तक मैं पहुंच गया था। उनके भाषण का मुझ पर यह प्रभाव पड़ा कि उन्होंने जो कुछ कहा वह हलके-फुलके तरीके से ही नहीं कहा बल्कि- यदि मैं यह कहूँ तो वह मुझे क्षमा करेंगे-उसमें किसी हद तक छिछोरापन झलकता था। उन्होंने कहा था कि लोगों पर मुकदमा चलाने का क्या लाभ होगा। लोग सत्याग्रह करने लगेंगे, लोग ऐसे-वैसे कार्य करने लगेंगे। इसलिये हमें कोई ऐसी कार्यवाही का सहारा नहीं लेना चाहिए जिसे विधि का प्रतिशोध कहा जाए। यदि गृह मंत्रालय का यही रवैया है तो निःसंदेह किसी प्रकार की कोई आशा