50. अनुसूचित जाति तथा जनजाति आयुक्त, 1953 का प्रतिवेदन - Page 374

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नहीं की जा सकती। अनुसूचित जातियों के विरुद्ध जो अराजकता हज़ारों वर्षों से चल रही है वह विधि-संगत है और विधि संगत ही रहेगी, क्योंकि अनुसूचित जाति के लोग स्वयं विधि का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध मुकदमा नहीं लड़ सकते। जैसा कि आयुक्त ने कहा है अनुसूचित जाति के लोग आर्थिक दृष्टि से सर्वथा हिंदुओं के इतने अधीन हैं और इतने दबे हुए हैं कि वे उन लोगों को कभी चुनौती देने की स्थिति में नहीं होंगे जिन पर वे आर्थिक आजीविका के लिए निर्भर हैं।

आयुक्त ने आरंभ से ही इस बात को स्वीकार किया है। इस बात का उल्लेख उसके पहले प्रतिवेदन में भी किया गया था, दूसरे प्रतिवेदन में भी किया गया और अब तीसरे में भी उसका उल्लेख है कि अनुसूचित जाति के लोग स्वयं अपने अधिकारों की रक्षा कर पाएंगे, ऐसा सोचना व्यर्थ है। अपना दमन करने वालों पर मुकदमा करने के लिये उनके पास न तो साधन हैं न ही उनके विरुद्ध लड़ने के लिए आर्थिक सामर्थ्य है।

दूसरी बात, जिस पर आयुक्त ने अधिक बल नहीं दिया है और मैं इस बात को 20 वर्षों के अनुभव से स्वयं जानता हूँ कि अनेक मामलों में पुलिस बल सवर्ण हिंदुओं के साथ मिला होता है। 90 प्रतिशत पुलिस कर्मचारी सवर्ण हिंदुओं में से भर्ती किए जाते हैं। अब केवल कुछ प्रतिशत पुलिस कर्मी अनुसूचित जातियों में से भर्ती किये जाने लगे हैं और वे भी पुलिस के सिपाही के ओहदे पर लिए जाते हैं। उनमें कोई भी अधिकारी नहीं होता। इसका परिणाम यह है कि उच्च श्रेणी के पुलिस कर्मी सवर्ण हिंदुओं के साथ मिले हुए हैं। जब अनुसूचित जातियों के लोग थाने में जाते हैं तो वे प्रायः उनकी शिकायतें अपनी केस डायरी में दर्ज करने से इंकार कर देते हैं, भले ही वह अपराध संज्ञेय ही क्यों न हो। वे उनको थाने से बाहर निकाल देते है और उनसे कहते हैं कि ‘‘भाग जाओ।’’ पहले तो वे उसकी शिकायत दर्ज ही नहीं करते और यदि करते भी हैं तो वे ऐसे बेहूदा तरीके से जांच-पड़ताल करेंगे कि अंततोगत्वा मुकदमा ख़ारिज हो जाएगा। ऐसी स्थिति में, मैं माननीय गृह मंत्री से पूछना चाहता हूँ कि क्या वह सोचते हैं कि उनका कोई कर्तव्य है या नहीं। मैं उनसे पूछता हूँ कि विधि के उल्लंघन के मामले, जिनकी सूचना प्राप्त हो रही है और जिनके साक्षी अनुसूचित जाति के लोग हैं व अन्य लोग हैं क्या वे मूल विधि और मूल अधिकारों के उल्लंघन हैं या नहीं हैं? क्या मूल अधिकार संविधान के भाग नहीं हैं? यदि आप मूल अधिकारों को कुचलने के लिए इतनी बड़ी संख्या में आततायियों को और गुंडों को अनुमति दे रहे हैं तो क्या यह संविधान की अवमानना नहीं है। क्या आपका यह कर्तव्य नहीं है कि आप अपने मंत्रालय में अथवा अलग से इस प्रयोजन के लिए एक विशेष विभाग बनाएं? अमरीका में एक न्यायिक विभाग है जिसका कृत्य व कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि संविधान और संघीय विधियों का सम्मान किया जाए। मेरे विचार में, यही उपयुक्त अवसर है कि गृह मंत्री इस बात को समझें कि