358 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यदि संविधान के अनुसार सब कार्यकलाप होने हैं, यदि देश का विधान बनना है, यदि सभी लोगों को यह मान्य होना है तो उनका काम यह सुनिश्चित करना है कि इसको ठीक तरीके से लागू किया जाये। यह तभी हो सकता है जब वह इसको लागू करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले। यह काम राज्य सरकारों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए क्योंकि वे इस काम को करने में असमर्थ हैं। इस काम को पुलिस भी नहीं कर सकती। क्योंकि वे ऐसा करना ही नहीं चाहते। फिर अनुसूचित जनजाति के लोग भी नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास इसको लागू करने के साधन नहीं हैं। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि वह इस मामले को गंभीरता से लें और वह इस काम को इस तरीके से करें, जैसे कि किसी राजनीतिज्ञ को करना चाहिए।
अब मैं शिक्षा के विषय में कुछ कहना चाहूँगा। यह संतोष की बात है और मैं स्वीकार करता हूँ कि सरकार अनुसूचित जातियों की शिक्षा पर प्रति वर्ष अधिक से अधिक धनराशि खर्च करती है। यदि मैं अपने बारे में कुछ कहूँ तो आशा है कि आप मुझे क्षमा करेंगे। वर्ष 1942 में पहली बार भारत सरकार ने मेरे आग्रह करने पर, जब मैं कार्यकारी परिषद का सदस्य था, स्वीकार किया था कि अनुसूचित जातियों को शिक्षा के संबंध में उनकी भी जिम्मेदारी है। उससे पूर्व शिक्षा केवल प्रांतीय विषय था। जहाँ तक मुसलमानों और हिंदुओं का संबंध था भारत सरकार ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को तीन लाख रुपये का वार्षिक अनुदान देकर उनकी सामर्थ्य की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी है। मैंने यह मामला उठाया कि क्या जिस सरकार ने मुसलमानों और हिंदुओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की है, उसका अनुसूचित जातियों के प्रति कोई कर्त्तव्य नहीं है और सरकार ने इस बात को माना कि यह सही बात है और उसका उत्तर स्वीकारात्मक ही मिला। उन्होंने केंद्रीय निधि में से अनुसूचित जातियों की शिक्षा के लिए 3 लाख रुपये, अनुदान के रूप में दिये, यद्यपि मैं अनुसूचित जातियों के लिए प्रतिवर्ष शिक्षा संबंधी अनुदान बढ़ाये जाने के विषय में हो रही प्रगति से संतुष्ट हूँ, फिर भी मैं दो बातों के बारे में काफी असंतुष्ट हूँ। एक बात यह है कि वर्ष 1942 में जब मैंने भारत सरकार में पहली बार इस मामले को उठाया था तब इस बात पर सहमति हुई थी कि भारत में विश्वविद्यालय स्तर तक अनुसूचित जातियों की शिक्षा की जिम्मेदारी प्रांतीय सरकारों की होगी और भारत सरकार अनुसूचित जातियों की शिक्षा के लिए जितनी धनराशि देगी वह विदेशों में उनकी शिक्षा पर खर्च की जाएगी। इस समझौते के अनुसार अनुसूचित जातियों के छात्रों का पहला ग्रुप इंग्लैंड भेजा गया था। यद्यपि इंग्लिश व अमरीकी विश्वविद्यालयों में प्रवेश के मामले में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा था, क्योंकि वहाँ छात्रों की बहुत भीड़ थी फिर भी भारत सरकार ने यहाँ से विदेशी विश्वविद्यालय पर काफी जोर डाला था, कि चूंकि यह पहला अवसर है जब सबसे निचले तबके के छात्रों को उच्चतर शिक्षा के लिए भेजा जा रहा है, विदेशी