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विश्वविद्यालयों को उनके मामले में कुछ सहानुभूति दिखानी चाहिए। इसका परिणाम यह निकला कि अनुसूचित जातियों के लगभग 30 छात्रों को प्रवेश मिल गया। तत्पश्चात् वर्ष 1945 में पुरानी सरकार गयी और वर्ष 1946 में काँग्रेस सरकार ने सत्ता संभाली। मुझे आशा थी कि जो व्यवस्था वर्ष 1943 या उसके आसपास आरंभ की गई थी, जिसको कार्यरूप दे दिया गया था और जिसके अंतर्गत भारत में और विदेशों में अनुसूचित जाति के लोगों की शिक्षा के लिए सरकार ने जिम्मेदारी स्वीकार कर ली थी, वह जारी रहेगी। परंतु मुझे तब बहुत हैरानी हुई और दुःख भी हुआ जब मैंने देखा कि श्री राजगोपालाचारी जो काँग्रेस सरकार के शिक्षा मंत्री बने और जो किसी अनुचित काम को भी उचित दिखाए जाने में बहुत प्रवीण थे, ने अनुसूचित जाति के छात्रों को विदेश भेजने की व्यवस्था समाप्त कर दी। उसके बाद अनुसूचित जाति का कोई भी छात्र विदेशों में अग्रेतर पढ़ाई के लिये नहीं गया। मैं तो यही कहूँगा कि यह बहुत ही खतरनाक बात हुई है। निःसंदेह हिंदू लोग मेरी आलोचना को पसंद नहीं करते, परंतु मैं जानता हूँ कि मेरी आलोचना सही है। मेरी इस बात का कितना भी विरोध क्यों न हो, मैं फिर भी आलोचना करना जारी रखूंगा।
श्री बी. के. पी. सिन्हा (बिहार) : परंतु अनुसूचित जातियों के लोग भी हिंदू हैं।
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डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : जी, यदि आप उनको ऐसा समझें। कानूनी दृष्टि से मैं भी हिंदू हूँ। श्री बी. के. पी. सिन्हा : सच भी यही है।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, बात यह है कि इस देश में, मैं उन कारणों में इस समय नहीं जाना चाहता, यह बिल्कुल सच है कि ऊंचे वर्गों के लोगों को सबसे ऊंची शिक्षा मिलती है। उनके बच्चें कैंब्रिज जाते हैं ऑक्सफोर्ड जाते हैं, कोलंबिया यूनिवर्सिटी जाते हैं और विदेशों में दूसरे सभी विश्वविद्यालयों में जाते हैं।
डॉ. के. एन. काटजू : संभवतः मेरे माननीय मित्र यह नहीं जानते कि हरिजन अथवा अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को भी विदेशों में भेजा जाता है।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : अच्छा, तो आपको पछतावा हो रहा है।
डॉ. के. एन. काटजू : उनको इससे लाभ पहुंच रहा है।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं सुन नहीं सकता।
डॉ. के. एन. काटजू : क्या मैं कुछ बोल सकता हूँ? वह शिकायत कर रहे हैं कि अनुसूचित जातियों के सदस्यों को विदेशी छात्रवृत्तियाँ देने की व्यवस्था का परित्याग कर दिया गया है, जो वर्ष 1946 में राजाजी द्वारा दी जा रही थीं। मैंने केवल इतना कहा है कि आज भी उनको छात्रवृत्तियाँ दी जाती हैं और उस योजना को गत वर्षों