50. अनुसूचित जाति तथा जनजाति आयुक्त, 1953 का प्रतिवेदन - Page 382

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संख्या 1478 होनी चाहिए थी। मेरे विचार में वर्ग IV के कर्मचारी चपरासी होते हैं और इस वर्ग में अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या काफी अधिक है। ये सब आंकड़े गृह मंत्रालय की निगाह में होने चाहिए। उन्होंने एक अनुपात निर्धारित किया है और निश्चय ही इस बात को सुनिश्चित करना उनका कर्तव्य है कि विभिन्न मंत्रालय उस अनुपात को ध्यान में रखकर काम करें। विभिन्न मंत्रालय इसके कार्यान्वयन में गड़बड़ी क्यों करते हैं और गृह मंत्री ने क्यों कोई कार्यवाही नहीं की? यदि उन्होंने कोई कार्यवाही की है तो वह क्या है जिसमें उनके द्वारा निर्धारित कोटे के अनुसार अनुसूचित जाति के लोगों को पद प्राप्त हो सके? महोदय, यह तस्वीर बहुत ही निराशाजनक है। इस संदर्भ में मुझे एक कार्टून याद आता है जो विगत युद्धकाल में जर्मनों ने बनाया था। उस कार्टून में बताया गया था कि वाशिगंटन में एक बूढ़ा हब्शी था, जब युद्ध की घोषणा की गई तो उस हब्शी के मन में जैसा कि सब जानते हैं अमरीका में हब्शियों के गोरों के साथ अच्छे सम्बन्ध नहीं हैं- हब्शी बहुत कुद्ध रहते हैं, वे गोरों के साथ लड़ते रहते हैं कि उन्हें समान अवसर क्यों नहीं उपलब्ध कराए जाते- अचानक देश भक्ति की भावना जागृत हो गई और उसने सोचा कि उसे अपनी देश भक्ति की भावना अपने युवा बेटे को अंतरित कर देनी चाहिए। वह बाजार गया और अमरीका का राष्ट्रीय ध्वज-छोटा सा खरीदकर ले आया जिसे उसका लड़का पकड़ सके और उसने वह अपने लड़के को दे दिया। उसने कहा ‘‘मेरे बेटे, आज मैं तुम्हें अपनी राजधानी दिखाना चाहता हूँ’’ लड़का उसके भाव को नहीं समझा। लड़के को दॉंये हाथ में उठाकर और लड़के ने बायें हाथ में ध्वज पकड़ा हुआ था- वह उसको वाशिंगटन शहर के आसपास घुमाता रहा, उसको सुप्रीम कोर्ट दिखाई, काँग्रेस हाउस दिखाया, सीनेट आदि दिखाया और अंत में भोजन कर के वहाइट हाउस आ गया, वह एक या दो मिनट ठहरा और फिर लड़के से बोला, ‘‘मेरे प्यारे बेटे, यह हमारे प्रेजिडेंट का हाउस है।’’ परंतु लड़के ने कहा ‘‘पिताजी, आप क्या बात कर रहे हैं? वह गोरा आदमी है और आप उसकी प्रशंसा कैसे कर सकते हैं?’’ बूढ़े आदमी ने कहा ‘‘ओह, अपना मुंह बन्द रख, यह सिर्फ कहने की बात है।’’ अंदर से वह बिल्कुल काला है। मेरे विचार में, यह दृष्टांत गृह मंत्री पर भी लागू होता है, सफेद कपड़े पहनने के बावजूद वह मन से काले हैं और इसका प्रमाण है यह लापरवाही, जो इस बात से पता चलती है कि गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आदेशों का पालन नहीं होता, कोई कार्यवाही नहीं की जाती है।

मैंने सेवाओं की स्थिति स्पष्ट कर दी है और अब मैं प्रचार के विषय पर अपने विचार रखूंगा। मैं देखता हूँ कि भारत सरकार ने अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रचार करने के लिए वर्ष 1953-54 के लिए 50 लाख रुपये की मंजूरी दी है। मुझे पता चला है कि योजना यह है कि राज्य सरकारों द्वारा चुनी गई प्राइवेट एजेंसियों को कुछ धनराशि दी जाएगी और कुछ धनराशि भारत सरकार द्वारा सीधी अखिल भारतीय संगठनों को