366 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दी जाएगी। यह योजना है। मैं नहीं जानता कि अस्पृश्यता उन्मूलन से मेरे माननीय मित्र का अभिप्राय क्या है, अस्पृश्यता का अर्थ क्या है? हमें इसका अर्थ भली-भांति समझ लेना चाहिए। मेरी समझ के अनुसार अस्पृश्यता हिंदू समाज के मानसिक रोग का नाम है। यह कोई ऐसा दोष नहीं है जिससे मैं पीडि़त हूँ, न ही मेरे अंदर कोई रसौली है न ही मुझे गठिया का दर्द है और न ही कोई अन्य शारीकि अक्षमता है जिसका इलाज किया जा सके बल्कि यह प्रत्येक हिंदू के मन में समाया हुआ है कि अस्पृश्यता का पालन करना बहुत अच्छी बात है। मुझे समझ नहीं आता कि मेरे मित्र इस मानसिक अकड़ को कैसे सीधा करेंगे जो हजारों वर्षों से उनके मन में बैठी है। जब तक उन सबको किसी ऐसे अस्पताल में नहीं भेजा जाता जहाँ मानसिक रोगों का इलाज होता है तब तक उनका इलाज होना बहुत मुश्किल है। परंतु मैं उनको वहाँ नहीं भेजना चाहता। इसलिए हमें समझना चाहिए कि हम कहते क्या हैं और करते क्या हैं। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक व्यक्ति को समझना चाहिए कि अस्पृश्यता धर्म पर आधारित है। इसमें कोई संदेह नहीं है और ऐसा समझ लेने में कोई शर्म की बात नहीं है। मनु ने अपनी संहिता में निश्चित शब्दों में अस्पृश्यता का उल्लेख किया है। उसने लिखा है कि अछूत लोग गांव से बाहर रहेंगे, वे केवल मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करेंगे, वे साफ कपड़े नहीं पहनेंगे, वे अपने निर्वाह के लिये भीख मांगेंगे, आदि और फिर हिन्दुओं पर कैसे न आरोप लगाएं। हजारों वर्षों से इस गंदी नीति के अध्ययन के कारण उनके मन में यह सिद्धांत कूट-कूट कर भरा गया है कि अस्पृश्यता बहुत पवित्र वस्तु है। हिंदू को पढ़ाया गया है कि चूहा सबसे पवित्र है और उसका जीवन सर्वोत्तम है जो एक मोरी के भीतर रहता है और जिसका किसी के साथ कोई संबंध नहीं होता, उसे यह नहीं छूना चाहिए उसे वह नहीं छूना चाहिए, उसे यह नहीं खाना चाहिए उसे वह नहीं खाना चाहिए आदि और यही जीवन है जो एक चूहा उस मोरी में रहकर गुजरता है। यह चूहा किसी दूसरे चूहे को अपने घर भीतर घुसने नहीं देगा। यह स्थिति है और हम केवल इतना सुनिश्चित कर सकते हैं अस्पृश्यता जो कि हिन्दुओं की मानसिक ऐंठन हैं, उसको सार्वजनिक जीवन में इतना अधिक न उभारा जाए कि वह लोगों की नागरिक स्वतंत्रता में बाधक बनने लगे।
डॉ. पी. सी. मित्रा : अस्पृश्यता केवल एक रूढि़ है और प्रथा है।
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यदि आप मेरे साथ बैठकर इस विषय का अध्ययन करना
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चाहते हैं तो मैं आपके साथ कुछ घंटे बैठने को तैयार हूँ।
इसलिए, महोदय, इस प्रचार को मेरे लिए समझ पाना असंभव है। मैं अपने माननीय मित्र श्री कुंजरू से सहमत हूँ कि इसका कोई परिणाम नहीं निकल सकता बल्कि सार्वजनिक पैसा बेकार जाएगा।
दूसरे, मैं यह नहीं समझ पाया कि यह मामला सामाजिक कार्यकर्ताओं के संगठनों