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पता चला है जहाँ खेती नहीं होती। योजना आयोग के अनुसार यह क्षेत्र 980 लाख एकड़ है। इस बारे में मेरा सुझाव यह है कि मुझे पता चला है कि सरकार संविधान में संशोधन करने पर विचार कर रही है। उनको संविधान में संशोधन करने का बहुत शौक है। मेरी समझ में नहीं आता, कि यदि आपको हर शनिवार को उसमें संशोधन लाना है तो संविधान की आवश्यकता ही क्या है? फिर भी, जब आप संशोधन कर ही रहे हैं तो मेरा सुझाव है कि आप संशोधन कीजिए और बंजर भूमि की खेती को सूची संख्या I में रखिए जिससे यह मामला केंद्रीय सरकार के अधिकार-क्षेत्र में आ जाए। राज्य सरकारों के पास इस भूमि का विकास करने के साधन उपलब्ध नहीं हैं। उनकी स्थिति ऐसी है कि न तो वह स्वयं उसका विकास कर सकते हैं और न ही किसी अन्य व्यक्ति को उसका विकास करने देते हैं। इसलिए संविधान में संशोधन करके बंजर भूमि सूची संख्या I में सम्मिलित करने में कोई गलत बात नहीं होगी।
मैं दूसरा सुझाव यह देना चाहता हूँ, जो शायद कुछ लोगों को अच्छा न लगे, परंतु सुझाव देने में कोई हानि नहीं होगी। आप पुनः नमक कर लगा दो। हमारे देश में सबसे हल्का कर नमक कर ही है। जब यह समाप्त किया गया था इससे लगभग 10 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता था। अब यह राशि कम से कम 20 करोड़ हो जाएगी। निःसंदेह नमक कर महात्मा गांधी की स्मृति में समाप्त किया गया था। मैं उनका आदर करता हूँ और मैं आपको सुझाव देता हूँ कि आप इस कर को लगाएं और उससे अस्पृश्यजनों के विकास और पुनर्वास के लिये महात्मा गांधी के नाम से एक गांधी न्यासनिधि बनाएॅं। आखिरकार, हम सबके अनुसार अस्पृश्यजन उनको सबसे अधिक प्रिय थे और उनके निकट थे और इस बात का कोई कारण नहीं है कि गांधी जी स्वर्ग से इस परियोजना के लिये आशीर्वाद न दें अर्थात् कर लगाना और उसका उपयोग बंजर भूमि के विकास के लिए करना और उस पर अनुसूचित जाति के लोगों को बसाने के लिए करना। इसमें कथनी और करनी दोनों का ताल-मेल होगा। आप जानते हैं कि पोकर के खेल में वचन और कार्यनिष्पादन के बीच अंतर होता है। मैं आपको यह योजना बताता हूँ जिसमें कथनी ही नहीं बल्कि करनी भी है। मैं नहीं समझता कि इस देश की जनता को अनुसूचित जातियों के उत्थान के लिए नमक कर के माध्यम से अंशदान क्यों नहीं देना चाहिए। आप इसको गांधी कल्याण योजना के नाम से बजट के बाहर रख सकते हैं जो गांधी के नाम से बना रहेगा और उन लोगों को राहत मिलती रहेगी जिनको वह संरक्षण प्रदान करना चाहते थे और जिनका उत्थान करना चाहते थे। गृह मंत्री महोदय के लिए यह मेरा सुझाव है और मुझे आशा है कि वह इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे।
महोदय, मैंने अपनी बात कह दी है और मुझे कुछ नहीं कहना। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि सरकार विभिन्न सामाजिक कार्यकर्त्ताओं और सामाजिक एजेंसियों के माध्यम से यह जो प्रयास कर रही है, मुझे एक बात से कुछ दुख-सा होता है कि