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डॉ. अम्बेडकर : वह मुझे वास्तविक संकल्प दे सकते हैं; मैं सत्यापित कर सकता हूँ।
माननीय उपाध्यक्ष : कल यह प्रथम मामला होगा। उन्हें कोई संशोधन लाने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक, श्री सिधवा के संशोधनों का संबंध है, यही रहेगा।
श्री हिम्मतसिंगका : क्या मैं माननीय विधि मंत्री के विचार के लिए यह सुझाव दे सकता हूँ? यदि वह व्यापक रूप में प्रतिपादन रखें कि किसी समिति की सदस्यता, जहाँ अतीत में संदाय निश्चित राशि से अधिक नहीं है, लाभ का पद नहीं माना जाएगा, वह उसके अंतर्गत होगा।
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय विधि मंत्री पहले ही कह चुके हैं कि ऐसी व्यापक प्रतिपादना..................।
श्री हिम्मतसिंगका : यह केवल अतीत की बाबत है।
माननीय उपाध्यक्ष : अतीत की बाबत, विभिन्न धन राशियाँ दी गई हैं। 40/- रुपए, 50/- रुपए आदि।
श्री सोंधी : चालीस रुपये अधिकतम है।
माननीय उपाध्यक्ष : यदि माननीय सदस्य इन मामलों को विधि मंत्री के ध्यान में लाएं तो वह उदार होने और उससे ऐसा प्रतीत होने के बजाए कि हम अनेक सदस्यों को उन्मुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं, उन पर विचार करेंगे। हम स्वयं इस तरह के अभियोग में न फंसें।
एक माननीय सदस्य : वह केवल अतीत के लिए है।
माननीय उपाध्यक्ष : यदि कोई विशिष्ट प्रवर्ग है, जो विधि मंत्री के ध्यान में लाया जा सकता है। वह उन पर विचार करेंगे।
डॉ. अम्बेडकर : इस मामले में, संकल्प में 20/- रुपए उल्लिखित है।
पंडित कुंजरू : चर्चा को कल तक के लिए स्थगित करने से पूर्व, मैं एक सुझाव देना चाहता हूँ। समस्त परेशानी वित्त मंत्रालय के यह विनिश्चित करने से उत्पन्न हुई है कि यदि कोई सदस्य समिति में कार्य करते हुए, 20/- रुपए से बढ़ाकर 40/- रुपए कर देनी चाहिए जो कि संसद की बैठकों में उपस्थित होने के लिए संसद के सदस्य को दी जाती है, तब तो ये परेशानियाँ गायब हो जाएंगी। मान लीजिए, यदि वित्त मंत्रालय द्वारा यह मत स्वीकार कर लिया गया होता तो डॉ. अम्बेडकर द्वारा इस विधेयक को लाने की कोई आवश्यकता ही न होती। वित्त मंत्रालय इन सब परेशानियों को दूर कर सकता है और मात्र यह घोषणा करके माननीय सदस्यों के