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निष्पादन आवश्यक न हो, अच्छा नहीं होगा?
माननीय उपाध्यक्ष : जैसा कि माननीय सदस्य देखेंगे, यह वर्तमान सदस्यों से संबद्ध है। वर्ष 1951-1952 पहले ही प्रारंभ हो चुका है और संपूर्ण अवधि से निरर्हता हटाने के लिए तारीख 31 मार्च, 1952 तक बढ़ाई जानी है।
डॉ. पट्टाभि : किंतु हम अप्रैल, 1952 में भी बैठ रहे हैं।
माननीय उपाध्यक्ष : यदि यह नहीं बढ़ाई जाती है, तो उन सदस्यों को सीधे त्यागपत्र देना पडे़गा जो समितियों में कार्य करने के लिए सहमत हुए थे। इसलिए अवधि 31 मार्च, 1952 तक बढ़ाई जा रही है। अब हम वर्ष 1951-52 के मध्य में हैं इसलिए यह संशोधन आवश्यक है। क्या यह संशोधन अभी लागू होना चाहिए या इसके बाद, इस पर विधि मंत्री और सदन विचार करके फैसला कर सकता है। अनेक प्रवर्गों के अधीन निरर्हताओं को दूर करने के लिए हम विधान नहीं ला रहे हैं।
श्री सिधवा : महोदय, आप जो कहते हैं, बिल्कुल ठीक है। किंतु ये सलाहकार समितियाँ बहुत महत्वपूर्ण निकाय हैं। मेरा मुद्दा यह है और मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं सलाहकार समिति का सदस्य नहीं हूँ। मेरा मामला है- संसद के सदस्यों के रूप में रेल द्वारा यात्रियों और माल को ले जाने में हमारा हित है और कयोंकि समिति के सदस्य के रूप में कोई व्यक्ति 30/- रुपए या ऐसा ही भत्ता लेता है, इसलिए उसे संसद का सदस्य होने से विवर्जित नहीं किया जाना चाहिए। इस मामले में रेल वित्त समिति और सलाहकार समिति से सलाह ली जानी है। इसलिए मार्च, 1951 से मार्च 1952 तक तारीख परिवर्तन के प्रश्न को भी स्थगित रखा जाए और जब विधेयक अगली बार हमारे सामने आए तो उसी समय विधेयक के अन्य उपबंधों के साथ-साथ इस पर विचार किया जाए।
डॉ. पट्टाभि : यह क्यों नहीं कहते ‘‘वर्तमान संसद के कार्यकाल के दौरान।’’
डॉ. अम्बेडकर : मेरे विचार में संशोधन बहुत आसान है। इसका कारण है क्योंकि विधेयक में मूल रूप से उन शब्दों का उल्लेख नहीं जिनको संशोधन द्वारा अब पुरःस्थापित करना ईप्सित है क्योंकि विधेयक के बहुत पहले पारित होने की प्रत्याशा थी। वह नहीं हुआ। सदस्य बैठे रहे। यदि आप उन्हें लाभ के पद के इस नियम के प्रवर्तन से पूर्णतः मुक्त करना चाहते हैं तो उस अवधि को आगे जारी रखना आवश्यक है। भविष्य की बाबत मैं यह समझता हूँ कि भत्ते कम किए गए हैं ताकि कोई निरर्हता पैदा न हो। एक माननीय सदस्य : कितने?
डॉ. अम्बेडकर : वही 20/- रुपए।