36. असम सीमा परिवर्तन विधेयक - Page 53

36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कारण आप व्यावहारिक रूप से लोगों की राष्ट्रीयता भी हस्तांतरित करते हैं। वे एक अन्य राज्य के नागरिक हो जाते हैं। यह महसूस किया गया था कि यह बहुत अधिक है और संसद की सलाह लेना आवश्यक है, क्या ऐसा कदम उठाया जाना चाहिए, क्योंकि यह संभव था कि संसद इस बात पर जोर दे कि समर्पण आत्यंतिक निबंधनों में नहीं होना चाहिए अपितु, कुछ शर्तों के अध्यधीन हो। उदाहरणार्थ, संसद कह सकती है कि यद्यपि राज्यक्षेत्र हस्तांतरित किया जा सकता है किंतु हस्तांतरण के द्वारा लोगों को अपनी पुरानी राष्ट्रीयता कायम रखने के लिए अनुज्ञा दी जा सकती है या संधि में कोई अन्य उपबंध पुरःस्थापित किया जा सकता है जिसके द्वारा राष्ट्रीयता के हस्तांतरण को समर्पण की शर्त के रूप में स्वैच्छिक बनाया जा सकता है। चूंकि इसमें नागरिकता और राष्ट्रीयता अंतर्वलित थीं, इसलिए ब्रिटिश सरकार ने सदैव यह महसूस किया कि किसी भी संधि को संसद के समक्ष रखना वांछनीय है भले ही उसे राजा के विशेषाधिकार से किया गया हो, जिसके कारण संसद की मंजूरी अपेक्षित नहीं थी। यह महसूस किया गया कि उस क्षेत्र, जिसका समर्पण किया जा रहा है, में लोगों की राष्ट्रीयता अवधारित करने के लिए संसद को अधिकार दिया जाना चाहिए।

तीसरी बात यह है कि आंग्ल विधि के अधीन जबकि राज्यक्षेत्र के हस्तांतरण के लिए राजा के पास परमाधिकार था, इसलिए संधि अपने आप लोगों के अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती थी। यदि संधि के पालन के लिए कतिपय विद्यमान विधियाँ निराकृत या प्रभावित होती थी तो संधि स्वयं इसे करने के लिए सक्षम नहीं थी। उन विधियों को बदलने के लिए संसद की अलग मंजूरी अपेक्षित थी जो लोगों के अधिकारों, बाध्यताओं और दायित्वों को विनियमित करती थी ताकि उन्हें संधि के उपबंधों के अनुरूप बनाया जा सके।

ये प्रमुख कारण थे जिनकी वजह से आंग्ल विधि के अधीन, यद्यपि राज्यक्षेत्र के हस्तांतरण का अधिकार राजा का परमाधिकार था, कभी ब्रिटिश सरकार ने ऐसी समस्त संधियों को मंजूरी के लिए, संसद के समक्ष रखने की परिपाटी चालू कर रखी थी। वही कारण है जिसकी वजह से सरकार ने इस मामले में यह महसूस किया कि इस मामले को संसद के समक्ष लाना है और उसकी मंजूरी अभिप्राप्त करना वांछनीय है, क्योंकि इसी विधेयक में उस राज्यक्षेत्र, जिसका भूटान जैसे विदेशी राज्य को हस्तांतरित किया जाना ईप्सित है, के लोगों की राष्ट्रीयता की बाबत संसद द्वारा कुछ परिवर्तन किए जाने से मैं इंकार नहीं कर सकता।

उठाए गए अनेक प्रश्नों के बारे में ये मेरे निवेदन है। मेरा प्रथम निवेदन यह है कि संविधान के अनुच्छेद 2 और 3 का अवलंब लेना आवश्यक नहीं है क्योंकि उनका संबध भिन्न मामले से है। इस विधेयक और इस संधि का प्रयोजन सातवीं