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अनुसूची की विधायी सूची सं. 1 में प्रविष्टि 14 और 15 के अधीन आता है। इन दो प्रविष्टियों को विषय-वस्तु और परिधि के निर्वचन के अनुसार, मेरी राय में इस प्रकार के कानून की मंजूरी के लिए संसद को प्राधिकार देना पर्याप्त है।
श्री कॉमथ : इससे पहले कि आप आगे बढें़, महोदय क्या मैं चर्चा के दौरान महान्यायवादी के उपस्थित रहने के लिए निवेदन कर सकता हूँ क्योंकि सदन में महत्वपूर्ण मामले उठाए जा रहे हैं।
एक माननीय सदस्य : वह आस्ट्रेलिया में हैं।
श्री कॉमथ : क्या उनका डिप्टी यहाँ नहीं हैं?
अनेक सदस्य : खड़े हो गए।
माननीय उपाध्यक्ष : जो माननीय सदस्य पहले बोल चुके हैं उन्हें उठने की जरूरत नहीं है। उनका बोलने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि विधि मंत्री ने कुछ नए प्रश्न उठाए हैं।
डॉ. पट्टाभि (मद्रास) : ऐसे अनेक विषय, जो न तो विधेयक में हैं और न ही उद्देश्यों और कारणों के कथन में हैं, अब विधि मंत्री द्वारा प्रस्तुत किए हैं और यदि आपने इसका ध्यानपूर्वक अनुसरण किया हो तो संपूर्ण चर्चा नया रूप धारण करती है। संविधान के अनुच्छेद 3 के अधीन भाग (ग) के उद्देश्यों के कथन में एक निर्देश था। विधि मंत्री का यह कथन है कि संविधान के अनुच्छेद 3 का विधेयक से कुछ लेना देना नहीं है। महोदय, आप अपने फैसले पर पुनर्विचार करें और मामले में नए सिरे से चर्चा करने की इजाजत दें।
डॉ. अम्बेडकर : अनुच्छेद 3 केवल आनुषंगिक रूप से आता है क्योंकि राज्य क्षेत्र का समर्पण उस समय तक नहीं किया जा सकता जब तक असम की सीमाएं समायोजित नहीं हो जातीं। अन्यथा अनुच्छेद 3 की कोई सुसंगतता नहीं है।
डॉ. पट्टाभि : कल आप उस समय सदन में उपस्थित नहीं थे जब कुछ कथन किए गए थे......
डॉ. अम्बेडकर : खेद है, मैं यहाँ नहीं था। यदि कोई मुझे बताता तो मैं यहाँ उपस्थित हो गया होता। (रुकावट)। अनुच्छेद 3 केवल आनुषंगिक रूप में आता है। राज्यक्षेत्र का समर्पण असम की सीमाओं के पुनर्समायोजन का परिणाम है। जहाँ तक यह मामला है, अनुच्छेद 3 में इसका निर्देश होना चाहिए था।
डॉ. पट्टाभि : जिसके लिए अधिनियम में कोई संबंध नहीं है, मेरा अभिप्राय राज्य क्षेत्र के समर्पण से है।