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करता हूँ जो सरकार की इच्छाओं को लागू करने के लिए अपनाई जा रही है और जब मैंने विधि मंत्री को इसकी प्रतिरक्षा करते सुना तो मेरी सांस रुक गई। निश्चय ही उन्होंने कहा था कि वह संविधान के रचयिता हैं-न कि एकमात्र रचियिता......
डॉ. अम्बेडकर : मैंने नहीं कहा था कि मैं रचयिता हूँ, किंतु मैं उनमें से एक हूँ......
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : संविधान की रचना में उनको सबसे अधिक कार्य करना पड़ा था। ऐसा होते हुए कोई भी यह प्रत्याशा करेगा कि संविधान की पवित्रता और प्रतिष्ठा की प्रतिरक्षा करने के लिए वह पहले व्यक्ति होंगे। मैं विधि मंत्री गृहमंत्री भी, के भाषण को किसी अन्य सदस्य से समझ सकता था। किंतु जहाँ तक विधि मंत्री का संबंध है, उन्हें सुस्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि प्रस्ताव के निहितार्थ क्या हैं।
विधि मंत्री ने अमरीका की सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित कुछ निर्णयों को निर्दिष्ट किया है। मेरे अनुभव के बाद, पिछली बार जब हम संविधान (संशोधन) विधेयक पर चर्चा कर रहे थे, मैं विधि मंत्री की जल्दबाजी में की गई सिफारिशों को स्वीकार करने में झिझकता हूँ जब तक मैं उन्हें सत्यापित न कर लूँ........
डॉ. अम्बेडकर : ऐसी बातों से मुझे संरक्षण करना चाहिए। यदि मेरे मित्र मेरे कथन को चुनौती दे रहे हैं तो मैं स्वयं उसे चुनौती देने को अपने अधिकार को सुरक्षित रखूंगा, जो भी उन्होंने कहा है। मुझे यह बात अच्छी तरह से स्पष्ट करनी चाहिए।
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : विधि मंत्री इतना अधिक विरोध कर रहे हैं।
डॉ. अम्बेडकर : यह इतना अधिक विरोध करना नहीं है किंतु मैंने सुना है आपने किसी अन्य दिन जब मैं उपस्थित नहीं था, ऐसा कहा था।
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : आप यहाँ थे किंतु जब मैं बोल रहा था तो आप चले गए थे।
डॉ. अम्बेडकर : आप इतने भयानक आदमी नहीं हैं जो मुझे भागने के लिए विवश कर सकें।
डॉ. एस. पी. मुखर्जी : जहाँ तक भीम राव अम्बेडकर का संबंध है, उसे कौन डरा सकता है?
डॉ. अम्बेडकर : मैं इन लांछनों को पसंद नहीं करता हूँ। आपने वक्तव्य दिया है। मैं जानता हूँ, मैं यहाँ उसे चुनौती देने के लिए नहीं हूँ किन्तु मैं दूँगा...
माननीय उपाध्यक्ष : क्या माननीय सदस्यों को इस तरह के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए?