44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
होती है या अनुच्छेद 3 में अधिकथित प्रक्रिया लागू होती है। हमें केवल एक बिंदु का हवाला देना है और वह यह है : विधेयक का मुख्य प्रयोजन क्या है? कया विधेयक का मुख्य प्रयोजन असम की सीमाओं का पुनर्समायोजन है या विधेयक का मुख्य प्रयोजन भूटान के राज्य क्षेत्र का समर्पण करना है और असम की सीमा में जिससे यह राज्यक्षेत्र लिया गया है, में आवश्यक परिणामिक समायोजन करना है। इस प्रकार के मामले में, जहाँ दोनों पहलू विद्यमान हैं (और किसी भी समर्पण में अवश्य विद्यमान होने चाहिए क्योंकि समर्पण में पुनर्समायोजन का परिणाम अवश्य होना चाहिए), मेरा निवेदन है कि अपनाई जाने वाली प्रक्रिया विधेयक के मुख्य प्रयोजन को लागू करने की प्रक्रिया होनी चाहिए न कि सहायक या आनुषंगिक प्रयोजन को लागू करने के लिए। यद्यपि इस विधेयक का प्रारूपण इस रूप में किया गया है कि सीमाओं का पुनर्समायोजन करना मुख्य प्रयोजन प्रतीत हो, फिर भी वास्तविक प्रयोजन राज्यक्षेत्र का समर्पण करने का है। ऐसी स्थिति में मेरा निवेदन है कि वह प्रक्रिया, जो सातवीं अनुसूची की प्रविष्टियों में उल्लिखित किसी विषय की विधियों को प्रभावी रूप देने के लिए संविधान द्वारा विहित की गई हैं, सही प्रक्रिया है और सरकार ने संविधान द्वारा अधिकथित सबसे सही प्रक्रिया का अनुसरण किया है।
माननीय उपाध्यक्ष : भले ही यह सीमाओं का समायोजन हो तो भी क्या निहित प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया गया है? विदेश कार्य उपमंत्री (डॉ. केसकर) : यही किया गया है।
डॉ. अम्बेडकर : यदि ऐसा है तो वह प्रश्न भी कायम नहीं रहता।
माननीय उपाध्यक्ष : अनुच्छेद 3 में अधिकथित प्रक्रिया का भी अनुसरण किया गया है। इसलिए मैं डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कहने का यह अर्थ समझता हूँ कि वे प्रविष्टि 14 के अधीन समर्पण के अधिकार को स्वीकार नहीं करते और इसीलिए वे कहते हैं कि संविधानिक संशोधन आवश्यक है। श्री नजीरुद्दीन अहमद (पश्चिमी बंगाल) : खड़े हो गए।
माननीय उपाध्यक्ष : मैं माननीय सदस्यों को फिर से बोलने की अनुमति देना नहीं चाहता हूँ जो पहले ही बोल चुके हैं, जब यह विषय कल व्यवस्था के प्रश्न के रूप में उठाया गया था।
* डॉ. अम्बेडकर (विधि मंत्री) : मैं पहले ही यह प्रस्तावित कर चुका हूँ कि इस विधेयक पर विचार किया जाए। मेरे लिए जो कुछ शेष रहता है वह इस विशिष्ट कानून के स्वरूप को और इसको लाने की आवश्यकता को स्पष्ट करना है। नोटरी
* संसदीय वाद-विवाद खड-14, भाग- II, 17 अगस्त, 1951, पृ. 832-835