56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सरकार को शीघ्रातिशीघ्र इस विषय पर विधान बनाना चाहिए।’’
श्री एस. एन. दास द्वारा एक संशोधन पेश है।
श्री एस. एन. दास (बिहार) : महोदय इससे पूर्व कि मैं अपना संशोधन रखूं मैं माननीय मंत्री का वक्तव्य सुनना चाहूँगा।
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय मंत्री संकल्प और संशोधन दोनों की बाबत वक्तव्य देंगे। इसलिए संशोधन पेश किया जाए।
श्री एस. एन. दास : मैं प्रस्ताव करता हूँः
मूल संकल्प के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाए :-
‘‘इस सदन की राय है कि अब समय आ गया है कि भारत सरकार विभिन्न राज्यों में प्रवृत्त विधिक वृत्ति से संबद्ध विधियों के कार्यकरण की जांच करने के लिए एक समिति नियुक्त करे जिससे कि अखिल भारतीय आधार पर एक स्वतंत्र और स्वायत्त बार की आवश्यकता, वांछनीय और व्यावहारिकता अभिनिश्चित की जा सके।’’
माननीय उपाध्यक्ष : संशोधन पेश किया गया :-
‘‘इस सदन की राय है कि अब समय आ गा है कि भारत सरकार विभिन्न राज्य में प्रवृत्त विधिक वृत्ति से संबद्ध विधियों के कार्यकरण की जांच करने के लिए एक समिति नियुक्त करे जिससे कि अखिल भारतीय आधार पर एक स्वतंत्र और स्वायत्त बार की आवश्यकता, वांछनीयता और व्यावहारिकता अभिनिश्चित की जा सके।’’
डॉ. अम्बेडकर : संसद के उन सदस्यों की जो इस सदन में विधिक वृत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, इच्छा रही है कि एक स्वतंत्र स्वायत्त और अखिल भारतीय बार हो। व्यक्तिगत रूप से मुझे पूर्ण तथा पर्याप्त ख्याल नहीं था कि सदस्यों का इससे ठीक-ठीक क्या मतलब है, जब वे कहते हैं कि वे एक स्वतंत्र और स्वायत्त बार चाहते हैं। किंतु मैं नहीं सोचता कि इस बारे में इस समय कोई चर्चा करने की आवश्यकता है कि स्वतंत्र तथा स्वायत्त बार कैसी हो और इसलिए मेरी राय है कि यह वांछनीय है कि इस मामले में जांच करने हेतु समिति नियुक्त की जाए ताकि इस मसले पर एक बार में पूरी चर्चा हो जाए।
इस मामले में विचार करने के पश्चात् मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँं कि भारत में बार के संबंध में संभवतः छह प्रश्न हैं जिन पर विचार किया जाना अपेक्षित है। एक है संपूर्ण भारत के लिए एक संपूर्ण समान बार की वांछनीयता और व्यावहारिकता, दूसरा काउंसल और सॉलीसीटर या अभीकŸार् की दोहरी प्रणाली जो उच्चतम न्यायालय और बंबई तथा कलकत्ता के उच्च न्यायालय में है; तीसरा विधि व्यवसायियों के