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* गृह मंत्री (श्री राजगोपालाचारी) : निस्संदेह, विधि मंत्री अधिक आधिकारिक तौर
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पर बोलेंगे। वह अनुच्छेद जो निर्दिष्ट किया गया है तथा कोई अन्य नियम जिसे सोचा जाए और साधारण अनुक्रम में लागू करने के लिए शब्दों में रखा जाए। तथापि साधारण सिद्धांत हैं जो हर प्रक्रिया के लिए मार्गदर्शक का काम करते हैं जिनमें न्यायिक प्रक्रिया का गुण होता है। किसी विधि या नियम का अवश्य निर्वचन किया जाए तथा उसे लागू किया जाना चाहिए ताकि विधि स्वयं में परिसीमित न हो। यहाँ ऐसा मामला है, जहाँ सदस्य के आचरण के बारे में पूछताछ करने के लिए कार्यवाहियाँ प्रारंभ हो चुकी थीं। मुझे यह मूलभूत साधारण सिद्धांत का मामला प्रतीत होता है कि संसद का उद्देश्य और उसकी प्रक्रिया इस तरह के तकनीकी कार्य द्वारा परिसीमित नहीं की जा सकती। इसमें वह आता है जो श्री संथानम ने कहा है कि वहाँ ‘यथाशीघ्र’ शब्द नहीं हैं जो स्वतः रिक्ति हो जाएं। मामले में किसी तकनीकी दोष के अलावा मेरा यह निवेदन है कि साधारण सिद्धांत महत्वपूर्ण है कि विधि, विधि के उद्देश्यों के लिए आशयित होती है, न कि उसे परिसीमित किया जाए।
माननीय उपाध्यक्ष : हमें माननीय विधि मंत्री को सुनना है।
डॉ. अम्बेडकर (विधि मंत्री) : यह प्रश्न मेरे समक्ष अचानक आया है इसलिए मैं केवल यह कह रहा हूँ, कि यदि मैं ऐसा कहूँ तो अनुच्छेद 101 खण्ड (3) को पढ़ने के पश्चात् मेरी प्रथम धारणा है। स्थान उन कारणों से खाली हो सकता है जो अनुच्छेद 101 और 102 में विनिर्दिष्ट किए गए हैं। अनुच्छेद 101, खण्ड (3) का उपखंड (ख) संसद के सदस्य द्वारा त्याग-पत्र को निर्देशित करता है, यह वह खंड है जिसके अधीन माननीय सदस्य ने, जिसका आचरण जांच की विषय-वस्तु है, कार्यवाही की है। एक अन्य अनुच्छेद भी है जो सदस्य चुने जाने और सदस्य होने के कारण निरर्हता के बारे में है। यदि सदस्य अनुच्छेद 102 में उल्लिखित शर्तों में से किसी एक में आता है तो वह भी स्थान खाली करता है। जो प्रश्न विचारार्थ उत्पन्न होता
* संसदीय वाद-विवाद, खड-14, भाग- II, 27 अगस्त, 1951, पृ. 3247-48