61
यह समझा जा सकता है कि यह उस दिन प्रभावी हो गया जब इसे आपके घर दिया गया था? ऐसे मामलों में मेरे द्वारा किया गया अर्थ ही वास्तविक अर्थ है।
माननीय उपाध्यक्ष : किंतु हम उस प्रश्न पर नहीं हैं।
* पंडित मैत्रा (पश्चिमी बंगाल) : महोदय, मैं चाहता हूँ कि आप और सदन के
| cax | ky |
|---|
माननीय सदस्य ध्यानपूर्वक इस बात को मस्तिष्क में रखें कि अब जो हम कार्यवाही कर रहे हैं, उसका कोई पूर्वोदाहरण नहीं हैं। संविधानिक विधि का एक प्रश्न उठाया गया है और यह बहुत महत्व का है। मेज़ पार्लियामेंटरी प्रैक्टिस में भी इस तरह का कोई पूर्वोदाहरण नहीं है।
डॉ. अम्बेडकर : हाँ, ठीक है।
पंडित मैत्रा : मैं जानता हूँ मेज़ के पार्लियामेंटरी प्रैक्टिस में शास्ति के कुछ प्रकार अधिकथित हैं, अर्थात्, परिनिंदा, भर्त्सना, जेल में डालना, आदि-ये सब चीजें, कोई नई नहीं हैं, जो प्रश्न मेरे माननीय मित्र गृह मंत्री ने उठाया है, यदि उस पर तर्कसंगत ढंग से देखें तो यह है कि जब एक बार कार्यवाही प्रारंभ हो जाती है वह कभी समाप्त नहीं हो सकती। क्या यही विधिक स्थिति है? इससे यह बात सामने आ रही है कि यदि माननीय सदस्य का कल देहाँत हो जाता, मैं एक काल्पनिक मामला ले रहा हूँ, तो क्या उस मामले में भी कार्यवाही आगे चलती? अपना विनिश्चय देते हुए मैं अध्यक्ष महोदय से इन बातों को ध्यान में रखने के लिए कह रहा हूँ। यह सांविधानिक प्रश्न है। प्रश्न यह है कि क्या सदस्य स्वयमेव अध्यक्ष को अपना त्याग-पत्र देते ही सीट खाली कर देता है। मैं अपने माननीय मित्र श्री संथानम की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि त्याग-पत्र प्रस्तुत किए जाने और उसके स्वीकार किए जाने के बीच कुछ समय का अंतराल होना चाहिए। संविधान में कहीं भी यह उपबंध नहीं किया गया है कि यह स्वीकार किया जाना चाहिए अथवा यह कि आप इसे स्वीकार करें या स्वीकार न करें। विधि उपबंध करती है, संविधान में यह उपबंध किया गया है, कि जिस क्षण कोई अपना त्याग-पत्र लिखित रूप में आपको देता है तो वह तभी प्रभावी हो जाता है और इस मामले में, महोदय, इस सदन की अध्यक्षता करते समय आपको व्यक्तिगत रूप से त्याग-पत्र दिया गया था। संविधान में कहीं भी यह उपबंध नहीं किया गया है कि समय अंतराल होना चाहिए। इसलिए जो प्रश्न उत्पन्न होता है वह यह है कि क्या जब कोई माननीय सदस्य संसद के पटल पर अपना त्याग-पत्र अध्यक्ष के हाथ में देता है तो क्या वह तत्काल अपना स्थान खाली कर देता है। यदि वह अपनी सीट खाली कर देता है तो इस प्रस्ताव पर आगे कार्यवाही की कोई गुंजाइश नहीं रहती है। इस मामले पर विचार
* संसदीय वाद-विवाद, खड-14, भाग- II, 24 सितंबर, 1951, पृ. 3251-54